भारत के टॉप सात शहरों में रेजिडेंशियल कंस्ट्रक्शन कॉस्ट **34%** बढ़ी है, जबकि प्रॉपर्टी के दाम **59%** उछल गए हैं। NCR और बेंगलुरु जैसे शहरों में जमीन की बढ़ती कीमतों के कारण अब डेवलपर्स लक्जरी हाउसिंग पर शिफ्ट हो रहे हैं, जिससे अफोर्डेबल घरों की सप्लाई पर संकट मंडरा रहा है।
जमीनों के दाम बने सबसे बड़ा फैक्टर
भारतीय रियल एस्टेट सेक्टर एक बड़े स्ट्रक्चरल बदलाव से गुजर रहा है। साल 2021 से अब तक घरों को बनाने की लागत में 34% का इजाफा हुआ है, लेकिन हैरानी की बात यह है कि प्रॉपर्टी की कीमतें 59% तक बढ़ गई हैं। इस गैप की मुख्य वजह मटेरियल की लागत नहीं, बल्कि जमीनों के दाम हैं। NCR और बेंगलुरु जैसे प्रमुख शहरी कॉरिडोर में पिछले 5 सालों में जमीन की कीमतें 50% से 130% तक बढ़ गई हैं, जिससे नए प्रोजेक्ट्स लाना डेवलपर्स के लिए चुनौती बन गया है।
लक्जरी हाउसिंग की तरफ डेवलपर्स का रुख
बढ़ती लागत के बीच डेवलपर्स ने अपनी रणनीति बदली है। अब उनका पूरा फोकस प्रीमियम और लक्जरी हाउसिंग पर है। डेटा के मुताबिक, ₹1.5 करोड़ से कम कीमत वाले घरों का मार्केट शेयर, जो पहले हावी था, वह Q1 2026 में गिरकर 47% रह गया है, जबकि एक साल पहले यह 57% हुआ करता था। इससे अमीरों के लिए तो विकल्प बढ़ रहे हैं, लेकिन आम आदमी के लिए अफोर्डेबल घरों की कमी होती जा रही है।
डेवलपर्स की बैलेंस शीट मजबूत, लेकिन डिमांड ठंडी
वित्तीय मोर्चे पर, लिस्टेड डेवलपर्स अब पहले से बेहतर स्थिति में हैं। टॉप 13 डेवलपर्स का डेट-टू-कलेक्शन रेशियो (Debt-to-collections ratio) FY20 के 1.80x से गिरकर FY26 में 0.68x पर आ गया है। यानी उन पर कर्ज का बोझ कम हुआ है। हालांकि, यह मजबूती अब परीक्षा की घड़ी में है, क्योंकि साल 2026 की पहली छमाही के दूसरे क्वार्टर में सेल्स में 6% की सालाना गिरावट दर्ज की गई है। यह संकेत है कि बढ़ते दामों का असर अब खरीदारों की जेब पर पड़ने लगा है।
चुनौती अभी बरकरार
ग्लोबल सप्लाई चेन में अस्थिरता, जैसे स्टील, फ्यूल और इम्पोर्टेड फिनिशिंग मटेरियल की बदलती कीमतें अभी भी डेवलपर्स के मार्जिन पर दबाव बनाए हुए हैं। जो प्रोजेक्ट्स पहले ही बिक चुके हैं, वहां मार्जिन कम होने का खतरा ज्यादा है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या लक्जरी मार्केट की चमक अफोर्डेबल और मिड-इनकम सेगमेंट की सुस्ती को पाट पाएगी या नहीं।
