भारत ने ग्लोबल फ्लेक्सिबल ऑफिस स्पेस मार्केट में दूसरी बड़ी पोजीशन हासिल कर ली है। साल 2026 की पहली छमाही में इंटरनेशनल बुकिंग में भारत की हिस्सेदारी उछलकर **10.2%** हो गई है, जिसके पीछे GCCs और IT कंपनियों की भारी डिमांड है।
भारत का कमर्शियल रियल एस्टेट सेक्टर तेजी से बदल रहा है। हालिया डेटा के मुताबिक, इंटरनेशनल को-वर्किंग और फ्लेक्सिबल ऑफिस बुकिंग में भारत का शेयर पिछले साल के 2.2% से बढ़कर 10.2% पर पहुंच गया है। अब भारत केवल अमेरिका से पीछे है।
इन्फ्रास्ट्रक्चर और डिमांड के ड्राइवर
साल 2026 की पहली छमाही तक भारत की कुल फ्लेक्सिबल ऑफिस इन्वेंट्री 88.7 मिलियन स्क्वायर फीट तक पहुंच गई है। इस ग्रोथ के पीछे सबसे बड़ा हाथ Global Capability Centres (GCCs) का है, जो कुल लीजिंग का 44% हिस्सा कवर कर रहे हैं। IT-BPM सेक्टर की कंपनियां अब लंबी अवधि के लीज के बजाय फ्लेक्सिबल स्पेस को प्राथमिकता दे रही हैं ताकि वे अपनी जरूरतों के हिसाब से विस्तार या कटौती कर सकें।
इंडस्ट्री के अनुमानों के मुताबिक, यह स्टॉक 2026 के अंत तक 100 मिलियन स्क्वायर फीट और 2030 तक 160 मिलियन स्क्वायर फीट के पार जा सकता है। Cushman & Wakefield ने भी भारत को सबसे परिपक्व (mature) फ्लेक्सिबल ऑफिस मार्केट माना है।
निवेशकों के लिए चेतावनी और रिस्क
ग्रोथ की कहानी मजबूत है, लेकिन निवेशकों को कुछ जोखिमों पर नजर रखनी चाहिए। सबसे बड़ा रिस्क 'सप्लाई-डिमांड असंतुलन' है। अगर डेवलपर्स जरूरत से ज्यादा प्रोजेक्ट्स लाते हैं, तो ऑक्यूपेंसी रेट और रेंटल यील्ड पर दबाव पड़ सकता है।
इसके अलावा, फ्लेक्सिबल ऑफिस ऑपरेटर्स के लिए फिट-आउट और मेंटेनेंस का खर्च काफी ज्यादा होता है। ग्लोबल IT स्पेंडिंग में कोई भी कमी इन कंपनियों के बजट को प्रभावित कर सकती है, जिसका सीधा असर लीजिंग एक्टिविटी पर पड़ेगा। निवेशकों को प्रमुख शहरों में ऑक्यूपेंसी लेवल्स और नए प्रोजेक्ट्स के पूरे होने की गति पर पैनी नजर रखनी चाहिए।
