IBBI का बड़ा फैसला: रियल एस्टेट सेक्टर में अब 'प्रोजेक्ट-वाइज' इन्सॉल्वेंसी की तैयारी

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AuthorAditya Rao|Published at:
IBBI का बड़ा फैसला: रियल एस्टेट सेक्टर में अब 'प्रोजेक्ट-वाइज' इन्सॉल्वेंसी की तैयारी

IBBI अब एक नया फ्रेमवर्क ला रहा है, जिससे बिल्डर्स की पूरी कंपनी के डूबने पर भी उनके अच्छे प्रोजेक्ट्स पर ताला नहीं लगेगा। यह कदम घर खरीदारों और निवेशकों के लिए गेम-चेंजर साबित हो सकता है।

नियम में क्या बदल रहा है?

अब तक के नियमों के तहत, अगर कोई रियल एस्टेट डेवलपर इन्सॉल्वेंसी में जाता था, तो उसकी पूरी कंपनी और सभी प्रोजेक्ट्स कानूनी चक्कर में फंस जाते थे। इससे वे प्रोजेक्ट्स भी रुक जाते थे जो आर्थिक रूप से मजबूत थे या पूरे होने के करीब थे। अब IBBI एक नया फ्रेमवर्क ला रहा है, जिससे डेवलपर्स को इन्सॉल्वेंसी प्रोसेस के दौरान प्रोजेक्ट्स को अलग-अलग करने की इजाजत मिलेगी।

कैसे काम करेगा नया सिस्टम?

किसी प्रोजेक्ट को अलग करने के लिए कमिटी ऑफ क्रेडिटर्स (CoC) की कम से कम 66% वोटिंग जरूरी होगी। इसके बाद National Company Law Tribunal (NCLT) की अंतिम मंजूरी लेनी होगी। इसका सीधा मकसद खराब प्रोजेक्ट्स को अलग कर अच्छे प्रोजेक्ट्स को चालू रखना है, ताकि काम न रुके।

निवेशकों और सेक्टर पर असर

मौजूदा समय में भारत में कुल इन्सॉल्वेंसी मामलों में से 22% रियल एस्टेट सेक्टर से आते हैं। अभी एक प्रोजेक्ट के फेल होने से पूरी कंपनी के सभी प्रोजेक्ट्स पर असर पड़ता था, जिसे 'डोमिनो इफेक्ट' कहा जाता है। इस नए बदलाव से इसी 'कॉन्टैजन' (फैलाव) को रोकने की कोशिश की जा रही है।

चुनौतियां अभी बाकी हैं

हालांकि यह इंडस्ट्री के लिए एक सकारात्मक कदम है, लेकिन यह पूरी तरह से संकट का समाधान नहीं है। सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि रेजोल्यूशन प्रोफेशनल्स इन अलग किए गए प्रोजेक्ट्स को कैसे संभालते हैं। साथ ही, Real Estate Regulatory Authority (RERA) के साथ तालमेल बिठाना भी एक बड़ी चुनौती होगी। इसके अलावा, जिन प्रोजेक्ट्स में लागत बढ़ने या फंड की कमी जैसी समस्याएं हैं, वहां मुश्किलें अभी भी बनी रह सकती हैं।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.