इंटरनेशनल कंपनियां अब भारत में केवल पैसा नहीं लगा रही हैं, बल्कि खुद घर बनाने (Active Development) के मैदान में उतर गई हैं। वियतनाम की दिग्गज कंपनी Vingroup ने महाराष्ट्र के लिए **$6.5 बिलियन** के प्रोजेक्ट का ऐलान किया है, जो प्रीमियम हाउसिंग की बढ़ती मांग को दर्शाता है।
भारत के रियल एस्टेट सेक्टर में विदेशी पूंजी का मिजाज बदल रहा है। अब तक बड़ी वैश्विक कंपनियां केवल कमर्शियल ऑफिस स्पेस या इनकम देने वाली संपत्तियों तक सीमित थीं, लेकिन अब वे सीधे रेजिडेंशियल प्रोजेक्ट्स और बड़े टाउनशिप के निर्माण में सक्रिय भूमिका निभा रही हैं।
एक्टिव डेवलपमेंट की ओर बढ़ते कदम
इस बदलाव के पीछे भारी निवेश का दम है। साल 2026 की पहली छमाही में भारत के रियल एस्टेट सेक्टर में $8.5 बिलियन का संस्थागत निवेश (Institutional Investment) आया, जो पिछले साल के मुकाबले 32% ज्यादा है। डेटा के मुताबिक, देश के 8 बड़े शहरों में बिकने वाले कुल घरों में से 54% हिस्सेदारी उन घरों की है जिनकी कीमत ₹1 करोड़ से ऊपर है। यह साफ संकेत है कि विदेशी खिलाड़ी अब प्रीमियम सेगमेंट पर पूरा फोकस कर रहे हैं।
Vingroup और महाराष्ट्र का मेगा डील
वियतनाम की कंपनी Vingroup का हालिया कदम इस ट्रेंड का सबसे बड़ा उदाहरण है। कंपनी ने महाराष्ट्र सरकार और मुंबई महानगर क्षेत्र विकास प्राधिकरण (MMRDA) के साथ लगभग $6.5 बिलियन का समझौता किया है। इसमें न केवल इंटीग्रेटेड टाउनशिप का निर्माण होगा, बल्कि इलेक्ट्रिक मोबिलिटी और सोशल इंफ्रास्ट्रक्चर पर भी काम किया जाएगा। सरकारी निकायों के साथ सीधे साझेदारी करके विदेशी कंपनियां भारत में जमीन अधिग्रहण और रेगुलेटरी चुनौतियों से बचने की रणनीति अपना रही हैं।
निवेशकों के लिए चेतावनी (Investor Monitorables)
बाजार में विदेशी पैसा आना सेक्टर की लिक्विडिटी के लिए अच्छा है, लेकिन चुनौतियां भी कम नहीं हैं। सबसे बड़ा रिस्क 'एग्जीक्यूशन' का है। टाउनशिप जैसे बड़े प्रोजेक्ट्स में जमीन के नियम, जोनिंग के नियम और पर्यावरण संबंधी मंजूरियों में अक्सर देरी होती है। इसके अलावा, बढ़ती कंस्ट्रक्शन कॉस्ट और लेबर की कमी मार्जिन पर दबाव डाल रही है। साथ ही, करेंसी में उतार-चढ़ाव (Rupee Depreciation) विदेशी निवेशकों के वास्तविक रिटर्न को प्रभावित कर सकता है।
