भारत के लिस्टेड ऑफिस REITs के लिए अब Global Capability Centres (GCCs) कमाई का सबसे बड़ा जरिया बन गए हैं। IT कंपनियों की मांग में कमी के बावजूद GCCs के कारण ऑफिस स्पेस की मांग और ऑक्यूपेंसी में मजबूती बनी हुई है।
भारत के रियल एस्टेट इन्वेस्टमेंट ट्रस्ट (REITs) के टेनेंट प्रोफाइल में बड़ा बदलाव दिख रहा है। मल्टीनेशनल कंपनियों की भारतीय R&D और इंजीनियरिंग यूनिट्स, जिन्हें Global Capability Centres (GCCs) कहा जाता है, अब नई ऑफिस डिमांड की ड्राइविंग फोर्स बन गई हैं। यह बदलाव तब हो रहा है जब पारंपरिक IT सर्विसेज कंपनियों की मांग में सुस्ती देखी जा रही है।
डिमांड का गणित
साल 2026 के पहले नौ महीनों में भारत की कुल ग्रॉस ऑफिस लीजिंग का लगभग 42% से 43% हिस्सा अकेले GCCs का रहा है। वहीं, दूसरी तरफ IT सर्विसेज सेक्टर की लीजिंग में करीब 36% की गिरावट दर्ज की गई है। इस शिफ्ट ने REITs को अपना ऑक्यूपेंसी रेट ऊंचा बनाए रखने में बड़ी मदद की है।
प्रमुख REITs का प्रदर्शन
इसका सीधा असर नतीजों में दिख रहा है। Embassy Office Parks REIT ने सितंबर 2026 को खत्म तिमाही में रेवेन्यू में 16% और नेट ऑपरेटिंग इनकम में 15% की बढ़त दर्ज की है। वहीं, Mindspace Business Parks REIT का ऑक्यूपेंसी रेट करीब 96.1% बना हुआ है, जबकि नया खिलाड़ी Bagmane Prime Office REIT 99% ऑक्यूपेंसी के साथ मजबूत स्थिति में है।
रिस्क और निवेशकों के लिए सतर्कता
हालांकि यह ट्रेंड स्टेबिलिटी ला रहा है, लेकिन इसमें कुछ रिस्क भी छिपे हैं:
- इंटरेस्ट रेट रिस्क: REITs पर कर्ज का बोझ होता है, इसलिए ब्याज दरें बढ़ने से डिविडेंड भुगतान प्रभावित हो सकता है।
- सेक्टर कंसंट्रेशन: अत्यधिक GCC निर्भरता के कारण, अगर ग्लोबल इकोनॉमी सुस्त होती है या कंपनियां अपने AI और R&D बजट घटाती हैं, तो रेंटल डिमांड पर सीधा असर पड़ेगा।
- ओवरसप्लाई: बेंगलुरु, हैदराबाद और पुणे जैसे शहरों में ऑफिस स्पेस की अधिक सप्लाई से रेंटल प्राइस पर दबाव बन सकता है।
निवेशकों को अब केवल ऑक्यूपेंसी आंकड़ों पर ही नहीं, बल्कि कंपनियों के डेट मैनेजमेंट, लीज रिन्यूअल शेड्यूल और बड़ी कंपनियों के हायरिंग बजट पर भी पैनी नजर रखनी चाहिए।
