साल 2026 की पहली छमाही में देश में फ्लेक्सिबल ऑफिस स्पेस का चलन तेजी से बढ़ा है। Coworking ऑपरेटरों ने भारत भर में **1.91 लाख** सीटें लीज पर ली हैं, जो पिछले साल के मुकाबले **68%** ज्यादा है।
भारत के कमर्शियल रियल एस्टेट मार्केट में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है, जहां कंपनियां अब पारंपरिक लंबी अवधि के ऑफिस लीज से दूर हो रही हैं। Cushman & Wakefield के डेटा के मुताबिक, भारत के शीर्ष आठ शहरों में 1.91 लाख सीटों की लीजिंग हुई है। इसके अलावा, ऑपरेटरों ने 8.4 मिलियन स्क्वायर फीट ऑफिस स्पेस किराए पर लिया है, जो साल 2025 की तुलना में 55% अधिक है। यह साफ दिखाता है कि फ्लेक्सिबल स्पेस अब कॉर्पोरेट रणनीति का अहम हिस्सा बन गया है।
क्यों बदल रही है कॉर्पोरेट रणनीति?
बड़ी कंपनियां और Global Capability Centres (GCCs) अब 'कोर-प्लस-फ्लेक्स' (core-plus-flex) रणनीति अपना रहे हैं। इसके तहत कंपनियां जरूरत के हिसाब से अपनी ऑपरेशंस को तुरंत स्केल अप या डाउन कर सकती हैं, जिससे उन्हें पारंपरिक ऑफिस सेटअप में होने वाले बड़े कैपिटल खर्च से राहत मिलती है।
प्रमुख शहरों का हाल और निवेशकों के लिए संकेत
बेंगलुरु इस दौड़ में सबसे आगे है, जहां 57,000 से ज्यादा सीटों की लीजिंग हुई है। वहीं हैदराबाद और मुंबई जैसे शहरों में भी तेजी से विस्तार देखा गया है। निवेशकों के नजरिए से देखें तो यह ट्रेंड लिस्टेड रियल एस्टेट इन्वेस्टमेंट ट्रस्ट (REITs) और बड़े कमर्शियल डेवलपर्स के लिए सकारात्मक है क्योंकि ये कंपनियां अक्सर ग्रेड ए (Grade A) ऑफिस स्पेस में निवेश करती हैं।
रिस्क फैक्टर और सावधानियां
हालांकि ग्रोथ शानदार है, लेकिन निवेशकों को कुछ जोखिमों पर भी नजर रखनी होगी। बाजार में सप्लाई बढ़ने से कुछ इलाकों में सैचुरेशन का खतरा हो सकता है। साथ ही, यह सेक्टर काफी हद तक IT, ITeS और GCCs पर निर्भर है, इसलिए इन इंडस्ट्रीज में किसी भी तरह की सुस्ती का असर डिमांड पर पड़ सकता है। भविष्य में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का ऑफिस स्पेस की जरूरत पर क्या असर पड़ेगा, यह भी देखने वाली बात होगी।
