भारतीय निवेशक अब दुबई के रियल एस्टेट मार्केट को भारत के मुकाबले एक बेहतर विकल्प के तौर पर देख रहे हैं। दुबई में **7-8%** तक का रेंटल यील्ड (Rental Yield) और बेहतर एमेनिटीज़ (Amenities) निवेशकों को आकर्षित कर रहे हैं। हालांकि, विदेश में निवेश करने से पहले करेंसी रिस्क (Currency Risk), लिबरलाइज्ड रेमिटेंस स्कीम (LRS) की सीमाएं और भारत में टैक्स देनदारियों जैसे मुद्दों पर गौर करना बेहद ज़रूरी है।
क्या है मामला?
भारतीय निवेशक दुबई की रियल एस्टेट मार्केट में दिलचस्पी दिखा रहे हैं। वे इसे भारत के बड़े शहरों जैसे मुंबई और दिल्ली-एनसीआर की महंगी प्रॉपर्टीज़ के मुकाबले एक आकर्षक विकल्प मान रहे हैं। इसकी मुख्य वजह दुबई में ज्यादा रेंटल इनकम और कीमत के हिसाब से बेहतर स्पेस मिलना है, जबकि भारत के प्राइम अर्बन सेंटर्स (Prime Urban Centers) में अक्सर कम जगह और ज्यादा कीमत मिलती है।
यील्ड और वैल्यू का अंतर
निवेशकों को लुभाने वाली सबसे बड़ी वजह रेंटल यील्ड (Rental Yield) का बड़ा अंतर है। मौजूदा आंकड़ों के मुताबिक, दुबई में रेंटल यील्ड आमतौर पर 7% से 8% के बीच है। वहीं, भारत के प्रमुख शहरों जैसे मुंबई, दिल्ली-एनसीआर, बेंगलुरु और हैदराबाद में यह 2% से 4% के आसपास ही रहता है। जो निवेशक इनकम के लिए प्रॉपर्टी में पैसा लगाना चाहते हैं, उनके लिए यह अंतर काफी मायने रखता है।
सिर्फ यील्ड ही नहीं, दुबई में प्रॉपर्टी वैल्यू फॉर मनी (Value for Money) भी ज्यादा मानी जा रही है। भारत के किसी मेट्रो शहर के बाहरी इलाके में जितनी कीमत में एक छोटा अपार्टमेंट मिलता है, दुबई में उतने ही पैसे में एक स्थापित इलाके में स्टूडियो या एक बेडरूम का यूनिट मिल सकता है। इन प्रॉपर्टीज़ में अक्सर गोल्फ कोर्स, बड़े हरे-भरे इलाके और प्रीमियम कंस्ट्रक्शन जैसी सुविधाएं शामिल होती हैं, जो भारत के घनी आबादी वाले शहरों में समान कीमत पर मिलना मुश्किल है।
असल जोखिम और ज़रूरी बातें
हालांकि, दुबई के प्रॉपर्टी मार्केट के आंकड़े आकर्षक लग रहे हैं, लेकिन विदेश में प्रॉपर्टी खरीदने के असल जोखिमों पर भी ध्यान देना चाहिए। सबसे बड़ा जोखिम है करेंसी रिस्क (Currency Risk)। भारतीय निवेशक अपनी कमाई रुपये में करते हैं और निवेश दिरहम (Dirham) में, जो अमेरिकी डॉलर से जुड़ा हुआ है। अगर डॉलर के मुकाबले रुपया कमजोर होता है, तो निवेश की असल लागत बढ़ सकती है और जब पैसा वापस भारत आएगा तो रिटर्न कम हो सकता है।
इसके अलावा, भारतीय निवासी रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) की लिबरलाइज्ड रेमिटेंस स्कीम (LRS) के तहत आते हैं। इसके तहत एक फाइनेंशियल ईयर (Financial Year) में विदेश में $250,000 (लगभग ₹2 करोड़ से ज़्यादा) ही भेजे जा सकते हैं। यह सीमा, बिना खास इजाज़त के, विदेश में प्रॉपर्टी खरीदने के लिए लगाए जाने वाले कैपिटल (Capital) को सीमित करती है।
टैक्स का गणित
भले ही दुबई में पर्सनल इनकम टैक्स (Personal Income Tax) या कैपिटल गेन टैक्स (Capital Gains Tax) नहीं लगता, लेकिन भारतीय निवासियों को अपनी टैक्स देनदारियों के बारे में पता होना चाहिए। भारत और यूएई के बीच डबल टैक्सेशन अवॉइडेंस एग्रीमेंट (DTAA) है। इसका मतलब है कि अगर आपको दुबई में टैक्स नहीं देना पड़ रहा है, तो भी आपको अपनी रेंटल इनकम और कैपिटल गेन को भारत में टैक्स फाइलिंग के दौरान बताना होगा। टैक्स का नियम आपकी रेजिडेंशियल स्टेटस (Residential Status) पर निर्भर करेगा। इसलिए, यह समझना ज़रूरी है कि भारतीय टैक्स रेजिडेंट (Indian Tax Resident) के लिए यह टैक्स-फ्री निवेश नहीं है।
इंफ्रास्ट्रक्चर और मार्केट का भविष्य
हाल के सालों में दुबई के रियल एस्टेट मार्केट में काफी ग्रोथ देखी गई है। डेटा बताता है कि यहां बड़े पैमाने पर कैश ट्रांजैक्शन्स (Cash Transactions) हुए हैं, जिसका मतलब है कि खरीदार कर्ज पर कम निर्भर हैं, जो मार्केट की स्थिरता का संकेत हो सकता है। आने वाले समय में, दुबई 2040 अर्बन मास्टर प्लान (Dubai 2040 Urban Master Plan) और एतिहाद रेल पैसेंजर नेटवर्क (Etihad Rail Passenger Network) जैसी सरकारी पहलें इंफ्रास्ट्रक्चर (Infrastructure) को बेहतर बनाने, कनेक्टिविटी बढ़ाने और नए रेजिडेंशियल हब (Residential Hubs) बनाने पर केंद्रित हैं। इन प्रोजेक्ट्स का मकसद '20-मिनट सिटीज' (20-minute Cities) बनाकर मांग को बढ़ाना है, जहां ज़रूरी सेवाएं आसानी से उपलब्ध हों।
निवेशकों को क्या देखना चाहिए?
विदेश में प्रॉपर्टी खरीदने वाले निवेशकों को सिर्फ ऊपर-ऊपर के आंकड़ों से ज़्यादा ध्यान देना चाहिए। कुछ ज़रूरी बातें जिन पर नज़र रखनी चाहिए, उनमें करेंसी एक्सचेंज रेट (Currency Exchange Rate) शामिल है, जो खरीदने की लागत और रिटर्न पर सीधा असर डालता है। आरबीआई (RBI) के LRS नियमों में बदलाव, दुबई प्रॉपर्टीज़ में मेंटेनेंस और सर्विस चार्ज, और DTAA या स्थानीय टैक्स नियमों में कोई भी अपडेट भी महत्वपूर्ण हैं। आखिर में, दुबई के खास इलाकों में प्रॉपर्टी की डिमांड और रेंटल ट्रेंड्स (Rental Trends) को समझना ज़रूरी है, क्योंकि प्रॉपर्टी की परफॉरमेंस (Performance) लोकेशन के हिसाब से काफी अलग हो सकती है।
