यह 'भू-आधार' सिस्टम असल में यूनिक लैंड पार्सल आइडेंटिफिकेशन नंबर (ULPIN) का ही दिल्ली वाला रूप है। हर ज़मीन के टुकड़े को एक यूनिक, जियो-रेफरेन्स्ड 14-डिजिट का कोड मिलेगा। ये कोड ड्रोन सर्वे और हाई-रेजोल्यूशन इमेजिंग जैसी टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करके बनाए जा रहे हैं। इसका सीधा टारगेट है ज़मीन की सीमाओं को लेकर होने वाले लंबे विवादों को जड़ से खत्म करना और प्रॉपर्टी के मालिकाना हक के रिकॉर्ड को ज़्यादा भरोसेमंद बनाना।
दिल्ली सरकार का यह कदम ज़मीन के रिकॉर्ड को डिजिटल बनाने की दिशा में एक बड़ी छलांग है। इस 14-डिजिट की पहचान संख्या से प्रॉपर्टी वेरिफिकेशन की प्रक्रिया तेज होगी, एक ही प्रॉपर्टी की बार-बार रजिस्ट्री होने के मामले कम होंगे। लोगों को अपनी ज़मीन के लिए एक सिंगल, वेरिफाइड रेफरेंस मिलेगा। इससे प्रॉपर्टी ट्रांजैक्शन (लेन-देन) में तेज़ी आएगी और अनिश्चितता कम होगी।
दिल्ली अकेला ऐसा राज्य नहीं है जो इस दिशा में काम कर रहा है। यह पहल पूरे भारत में डिजिटल लैंड रिकॉर्ड को मॉडर्नाइज़ करने के बड़े सरकारी प्रोग्राम (DILRMP) का हिस्सा है। देश की अदालतों में 66% से ज़्यादा सिविल केस ज़मीनी विवादों से जुड़े हैं। ऐसे में, ज़मीन के रिकॉर्ड्स को डिजिटल करने से इन विवादों में 20% से 30% तक की कमी देखी गई है, जैसा कि अन्य राज्यों में हुआ है। इस पारदर्शिता से बड़े इंस्टिट्यूशनल निवेशकों का भरोसा बढ़ेगा, क्योंकि ज़मीन अधिग्रहण में आने वाली मुश्किलें लंबे समय से एक बड़ी रुकावट रही हैं। एनालिस्ट्स का मानना है कि वेरिफाइड डिजिटल लैंड रिकॉर्ड्स प्रॉपर्टी की कीमतों में 15% से 25% तक का प्रीमियम दिला सकते हैं और ट्रांजैक्शन का समय महीनों से घटाकर हफ्तों का कर सकते हैं।
हालांकि, इस सिस्टम की सफलता ज़मीनी डेटा की सटीकता पर बहुत निर्भर करती है। अगर डेटा डिजिटाइज़ेशन या सुरक्षा में कोई चूक हुई, तो धोखाधड़ी के नए रास्ते खुल सकते हैं। साथ ही, खासकर बाहरी इलाकों में डिजिटल डिवाइड और लोगों में डिजिटल साक्षरता की कमी एक बड़ी चुनौती है। अलग-अलग सरकारी विभागों के बीच तालमेल बिठाना भी आसान नहीं होगा। ऐसे में, विवादों में कमी और ज़मीन अधिग्रहण में तेज़ी जैसे फायदे दिखने में कुछ वक़्त लग सकता है।
भविष्य में, यह ULPIN सिस्टम प्रॉपर्टी इकोसिस्टम को और पारदर्शी बनाने में अहम भूमिका निभाएगा। इसे बैंकिंग और फाइनेंशियल इंस्टीट्यूशंस से जोड़ने की योजना है, जिससे ज़मीन मालिकों को लोन और सब्सिडी मिलने में आसानी होगी। यह पहल रियल एस्टेट में फॉरेन डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट (FDI) को बढ़ावा देने और सरकार की हाउसिंग व इंफ्रास्ट्रक्चर योजनाओं को आगे बढ़ाने में भी मदद करेगी।