दिल्ली की 1,511 कॉलोनियों में प्रॉपर्टी पर मालिकाना हक हुआ आसान
दिल्ली सरकार ने 1,511 अनधिकृत कॉलोनियों में रहने वाले लोगों के लिए प्रॉपर्टी पर मालिकाना हक (ownership) पाने और निर्माण को नियमित (regularize) करने की प्रक्रिया को तेज करने के लिए एक नई नीति पेश की है। इस नीति का सबसे अहम बदलाव यह है कि अब पहले की तरह मौजूदा इमारतों के लिए लेआउट प्लान जमा करने की ज़रूरत नहीं होगी, जो कि पहले एक बड़ी बाधा थी। इसके साथ ही, दिल्ली डेवलपमेंट अथॉरिटी (DDA) की जगह अब सीधे रेवेन्यू डिपार्टमेंट ही कन्वेंस डीड (conveyance deed) जारी करने का काम संभालेगा।
कब से होगी आवेदन प्रक्रिया और क्या है लक्ष्य?
इस नई पॉलिसी के तहत आवेदन 24 अप्रैल से पी.एम.-यू.डी.ए.वाई. (PM-UDAY) पोर्टल पर शुरू हो जाएंगे। सरकार का लक्ष्य है कि कन्वेंस डीड जारी करने की प्रक्रिया को 45 दिनों के भीतर पूरा किया जा सके। यह पिछली पॉलिसी के मुकाबले एक बड़ा सुधार है, क्योंकि पहले की योजना के तहत लगभग 40,000 डीड ही जारी हो पाई थीं। यह कदम ऐसे समय में आया है जब दिल्ली-एनसीआर का रियल एस्टेट मार्केट (real estate market) मजबूत हो रहा है, जहां प्रॉपर्टी की वैल्यू में सालाना 8-10% की बढ़ोतरी देखी जा रही है और नए रेजिडेंशियल प्रोजेक्ट्स की लॉन्चिंग भी बढ़ी है।
पुरानी अड़चनें और नई योजनाएं
इससे पहले, 2019 में शुरू हुई पी.एम.-यू.डी.ए.वाई. (PM-UDAY) स्कीम जैसी पुरानी कोशिशें तकनीकी दिक्कतों और नौकरशाही के कारण धीमी साबित हुई थीं। अगस्त 2024 तक 1.22 लाख से ज़्यादा आवेदनों में से केवल 23,811 लोगों को मालिकाना हक मिल पाया था। पावर ऑफ अटॉर्नी (Power of Attorney) जैसे दस्तावेज जुटाने और लेआउट प्लान की मंजूरी में लगने वाला लंबा इंतजार कई सालों से प्रॉपर्टी रेगुलराइजेशन (regularization) की कोशिशों को प्रभावित कर रहा था। सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) के नियमों के अनुसार, प्रॉपर्टी रजिस्ट्रेशन से सीधे मालिकाना हक नहीं मिल जाता; असली मालिकाना हक का फैसला सिविल कोर्ट (civil court) ही करते हैं।
ट्रांजिट ओरिएंटेड डेवलपमेंट (TOD) पॉलिसी का इंटीग्रेशन
इसके अलावा, दिल्ली की संशोधित ट्रांजिट ओरिएंटेड डेवलपमेंट (TOD) पॉलिसी, जो मास्टर प्लान 2021 का हिस्सा है, अब इन अनधिकृत कॉलोनियों पर भी लागू होगी। TOD पॉलिसी का मकसद प्रमुख ट्रांजिट हब (transit hub) के आसपास घनी बसावट को बढ़ावा देना, फ्लोअर एरिया रेशियो (FAR) को 500% तक बढ़ाना और पब्लिक ट्रांसपोर्ट से जुड़ाव को मजबूत करना है। इससे हाउसिंग शॉर्टेज (housing shortage) को कम करने और ट्रैफिक को बेहतर बनाने में मदद मिलने की उम्मीद है।
नई पॉलिसी के जोखिम: 'जैसा है वैसा' नियम और इंफ्रास्ट्रक्चर की चिंताएं
इस नई पॉलिसी में 'जैसा है वैसा' (as is where is) के सिद्धांत पर मालिकाना हक देना कुछ जोखिम भी पैदा कर सकता है। यह मौजूदा ढांचागत समस्याओं या अनौपचारिक निर्माणों को बिना किसी सुधार के कानूनी बना सकता है, जैसा कि सुप्रीम कोर्ट ने पहले भी चेताया था। नए निर्माणों को अब म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन ऑफ दिल्ली (MCD) के नियमों का पालन करना होगा, जिससे कुछ कंप्लायंस (compliance) संबंधी दिक्कतें और टकराव की स्थिति बन सकती है, खासकर घनी आबादी वाली कॉलोनियों में। डी.डी.ए. (DDA) और एम.सी.डी. (MCD) जैसी एजेंसियों के बीच तालमेल की पिछली समस्याएं भी प्रक्रिया के सरलीकरण में बाधा डाल सकती हैं। यह नया तरीका उन पुराने नियमों को नजरअंदाज करता है जिनमें मालिकाना हक के साथ-साथ बेसिक सेवाओं और इंफ्रास्ट्रक्चर (infrastructure) पर भी जोर दिया गया था, जिससे भविष्य में सुविधाओं की कमी हो सकती है। भले ही प्रशासनिक स्तर पर रजिस्ट्रेशन आसान हो गया हो, लेकिन असली कानूनी मालिकाना हक और रजिस्ट्रेशन डीड के बीच का अंतर, जिसे सिविल कोर्ट तय करते हैं, बना रहेगा। यह भविष्य में मालिकाना हक को लेकर विवादों का कारण बन सकता है।
भविष्य की राह: तेज डीड जारी करना और शहरी नियोजन
सरकार का मुख्य लक्ष्य डीड जारी करने की प्रक्रिया को 45 दिनों के अंदर पूरा करके गति देना है। TOD फ्रेमवर्क के साथ इसका इंटीग्रेशन इन कॉलोनियों को व्यवस्थित शहरी नियोजन (urban planning) का हिस्सा बनाने और सघन, ट्रांजिट-केंद्रित विकास (transit-oriented development) को बढ़ावा देने की एक बड़ी योजना का संकेत देता है। इस योजना की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि ये सरलीकृत कदम कितनी प्रभावी ढंग से लागू होते हैं और सरकार नए निर्माणों के लिए कंप्लायंस (compliance) को कैसे संभालती है।