बॉम्बे हाई कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है, जिसके तहत प्रॉपर्टी के कानूनी वारिस और खरीदार अब बिल्डर्स से फ्लैट मिलने में देरी पर ब्याज का दावा कर सकते हैं। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि म्युनिसिपल अप्रूवल में देरी को अब 'फोर्स मेज्योर' (Force Majeure) नहीं माना जा सकता।
बॉम्बे हाई कोर्ट ने अपने हालिया आदेश में साफ कर दिया है कि घर मिलने में देरी होने पर मिलने वाला मुआवजा प्रॉपर्टी से जुड़ा है, न कि केवल मूल खरीदार से। अब कानूनी वारिस और प्रॉपर्टी ट्रांसफर कराने वाले नए मालिक भी बिल्डर्स से ब्याज पाने के हकदार हैं। इस फैसले से बिल्डर्स को राहत मिलने का रास्ता बंद हो गया है, क्योंकि अब वे खरीदार की मौत या प्रॉपर्टी के मालिकाना हक में बदलाव का बहाना बनाकर अपनी जवाबदेही से नहीं बच सकेंगे।
म्युनिसिपल देरी का बहाना अब नहीं चलेगा
अक्सर बिल्डर्स प्रोजेक्ट्स में देरी के लिए 'म्युनिसिपल अप्रूवल' या सरकारी मंजूरियों को 'फोर्स मेज्योर' (Force Majeure) यानी ऐसी घटना बताते हैं जो उनके नियंत्रण में नहीं थी। कोर्ट ने इस दलील को पूरी तरह खारिज कर दिया है। कोर्ट का मानना है कि सरकारी मंजूरी लेना और नियमों का पालन करना बिल्डर की बुनियादी जिम्मेदारी है। अपनी गलत प्लानिंग की सजा अब वे होमबायर्स पर नहीं डाल सकते।
क्या है पूरा मामला?
एक मामले में कोर्ट ने बिल्डर को ₹5.51 करोड़ की राशि पर 9% प्रति वर्ष की दर से ब्याज देने का आदेश दिया। यह प्रोजेक्ट 12 साल से अटका हुआ था (मार्च 2008 से फरवरी 2020 तक)। हालांकि याचिकाकर्ता ने 12% ब्याज की मांग की थी, लेकिन कोर्ट ने सेल एग्रीमेंट में तय शर्तों के अनुसार ही ब्याज देने का निर्देश दिया।
निवेशकों के लिए सबक
RERA के तहत आया यह फैसला होमबायर्स के लिए एक बड़ी जीत है। अब विवादों के दौरान मालिकाना हक के दस्तावेज और बिल्डर की विफलता का सही रिकॉर्ड रखना बहुत जरूरी हो गया है। इस फैसले के बाद बिल्डर्स के लिए अब कानूनी पचड़ों से बचकर अपनी जिम्मेदारी से भागना मुश्किल होगा।
