बैंगलोर के वेयरहाउस लीजिंग (Warehouse Leasing) बाजार में 2026 की पहली छमाही में **78%** की जोरदार तेजी देखी गई है। इस दौरान कुल **3.1 मिलियन वर्ग फुट** (MSF) पर लीजिंग हुई, जिसका मुख्य कारण थर्ड-पार्टी लॉजिस्टिक्स (3PL) कंपनियों की बढ़ती मांग रही। हालांकि, जमीन की बढ़ती कीमतें और संस्थागत निवेश (Institutional Investment) की कमी जैसे मुद्दे अभी भी चिंता का विषय बने हुए हैं।
मांग में जबरदस्त बढ़ोतरी
बैंगलोर का लॉजिस्टिक्स (Logistics) और इंडस्ट्रियल (Industrial) मार्केट 2026 की पहली छमाही में काफी फल-फूल रहा है। वेयरहाउस लीजिंग में पिछले साल की इसी अवधि की तुलना में 78% का इजाफा हुआ है। इस दौरान कुल 3.1 मिलियन वर्ग फुट (MSF) की लीजिंग दर्ज की गई, जिससे यह शहर लॉजिस्टिक्स के लिए एक प्रमुख केंद्र बना हुआ है। इसी के साथ, इंडस्ट्रियल मार्केट में कुल लीजिंग 4.4 MSF तक पहुंच गई, जो 2025 की दूसरी छमाही से 63% ज्यादा है।
किसने की सबसे ज्यादा लीजिंग?
इस मांग में सबसे बड़ा योगदान थर्ड-पार्टी लॉजिस्टिक्स (3PL) कंपनियों का रहा, जिन्होंने 58% लीजिंग की। ये कंपनियां दूसरे व्यवसायों के लिए शिपिंग और स्टोरेज का काम संभालती हैं। इसके अलावा, मैन्युफैक्चरिंग (Manufacturing) कंपनियों का योगदान 16% और ई-कॉमर्स (E-commerce) कंपनियों का 15% रहा।
इलाकों का प्रदर्शन
बैंगलोर के पश्चिमी कॉरिडोर (Western Corridor), जिसमें नेलमंगला (Nelamangala) और डबस्पेट (Dabaspete) जैसे इलाके शामिल हैं, ने 52% लीजिंग वॉल्यूम के साथ बाजार का नेतृत्व किया। वहीं, होसकोटे (Hoskote) के आसपास के पूर्वी उप-बाजार (Eastern Submarket) का योगदान 46% रहा।
किराए और खाली जगहों पर असर
इस मजबूत मांग के चलते, इस साल की पहली छमाही में शहर में आई नई ग्रेड ए सप्लाई (Grade A Supply) का लगभग 2 MSF अवशोषित हो गया। नतीजतन, बाजार में खाली जगहों का स्तर (Vacancy Levels) घटकर 11% रह गया है, जो पहले 13% था। खाली जगह में कमी और लगातार बनी हुई रुचि के कारण कीमतों पर दबाव बढ़ा है। कुश्मन एंड वेकफील्ड (Cushman & Wakefield) के आंकड़ों के अनुसार, वेयरहाउस किराए में सालाना 4-5% की वृद्धि हुई है, जबकि जमीन की कीमतों में 9-10% का इजाफा हुआ है। इंडस्ट्रियल सेगमेंट में भी किराए में 3-4% की सालाना बढ़ोतरी देखी गई है।
बाजार के जोखिम और निवेशकों के लिए बातें
जहां मांग के आंकड़े मजबूत दिख रहे हैं, वहीं इस सेक्टर को कुछ चुनौतियों का भी सामना करना पड़ रहा है। इस गतिविधि के बावजूद, 2026 की पहली छमाही में इंडस्ट्रियल और वेयरहाउसिंग सेगमेंट को कुल संस्थागत रियल एस्टेट निवेश (Institutional Real Estate Investments) का केवल 1% ही मिला है। यह दर्शाता है कि बड़े संस्थागत निवेशक अभी भी सतर्क हैं। डेवलपर्स को बढ़ती जमीन और निर्माण लागत जैसी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। यदि इन खर्चों को किराए में वृद्धि के माध्यम से पूरा नहीं किया जा सका, तो डेवलपर्स के मार्जिन पर दबाव आ सकता है। इसके अलावा, भले ही मौजूदा मांग अधिक है, लेकिन वैश्विक व्यापार अनिश्चितताओं और भू-राजनीतिक बदलावों जैसे मैक्रो-इकोनॉमिक कारक (Macro-economic factors) यह प्रभावित कर सकते हैं कि कंपनियां आने वाले महीनों में विस्तार करने या नए लीज एग्रीमेंट पर हस्ताक्षर करने का निर्णय कितनी जल्दी लेती हैं। लॉजिस्टिक्स स्पेस में निवेशकों को यह देखना चाहिए कि कहीं नई सप्लाई की दर मांग के साथ असंतुलित न हो जाए, जिससे अतिरिक्त सप्लाई की स्थिति पैदा हो। साथ ही, यह भी महत्वपूर्ण है कि किराए में वृद्धि जमीन और निर्माण की बढ़ती लागतों के साथ तालमेल बिठा सके।
