बेंगलुरु में प्रशासन के बदलाव के कारण रियल एस्टेट सेक्टर संकट में है। Greater Bengaluru Authority (GBA) के गठन के बाद प्रोजेक्ट्स को मंजूरी मिलने में **16 हफ्ते** तक की देरी हो रही है, जिससे डेवलपर्स पर आर्थिक बोझ बढ़ गया है।
बेंगलुरु में नगर प्रशासन को Bruhat Bengaluru Mahanagara Palike (BBMP) से Greater Bengaluru Authority (GBA) में बदलने की प्रक्रिया सितंबर 2025 से शुरू हुई थी, जिसने डेवलपर्स के लिए बड़ी मुश्किल खड़ी कर दी है। शहर में ऑफिस स्पेस और अन्य प्रोजेक्ट्स के लिए जरूरी मंजूरी जैसे लैंड-यूज़ चेंज और बिल्डिंग प्लान के लिए 4 से 16 हफ्ते तक का इंतजार करना पड़ रहा है।
बढ़ता आर्थिक बोझ
इस एडमिनिस्ट्रेटिव अड़चन के कारण डेवलपर्स की बड़ी पूंजी फंस गई है। हालांकि उनके पास फंड उपलब्ध हैं, लेकिन निर्माण कार्य शुरू न हो पाने से एसेट 'आइडल' यानी बेकार पड़े हैं। इस देरी की वजह से डेवलपर्स पर सालाना 14% से 19% की भारी-भरकम फाइनेंसिंग कॉस्ट का दबाव बन रहा है, जो प्रोजेक्ट की कुल लागत को बढ़ा रहा है।
डिमांड में कोई कमी नहीं
चुनौतियों के बावजूद, ऑफिस स्पेस की मांग मजबूत बनी हुई है। Global Capability Centres (GCCs) का दबदबा बरकरार है, जिनका साल 2026 की पहली छमाही में भारत के प्रमुख शहरों में कुल ऑफिस लीजिंग में 45% हिस्सा रहा है। लेकिन अनिश्चितता के चलते सप्लाई चेन लड़खड़ा रही है।
इंफ्रास्ट्रक्चर का पेंच
समस्या सिर्फ मंजूरी तक सीमित नहीं है। GBA की देखरेख में चल रहे करीब 70% 'व्हाइट-टॉपिंग' रोड प्रोजेक्ट्स अगस्त 2026 की डेडलाइन मिस कर चुके हैं। इसका सीधा असर Outer Ring Road जैसे प्रमुख कमर्शियल हब की कनेक्टिविटी पर पड़ रहा है।
अब सबकी नजरें Supreme Court के उस आदेश पर हैं जिसके तहत 31 अगस्त 2026 तक पांच नई म्युनिसिपल कॉरपोरेशन्स के चुनाव पूरे होने हैं। इन नई संस्थाओं के स्थिर होने के बाद ही यह साफ होगा कि क्या मंजूरी की ये प्रक्रियाएं जल्द पटरी पर लौटेंगी या नहीं।
