निर्माण प्रक्रिया पर अब 'ग्रीन' फोकस
शहर के चीफ कमिश्नर महेशवर राव ने इस बात पर ज़ोर दिया है कि निर्माण की प्रक्रिया (construction process) भी 'ग्रीन' होनी चाहिए। उनका कहना है कि बिल्डिंगों के निर्माण के दौरान होने वाली गतिविधियां शहर की हवा की गुणवत्ता (air quality) और क्लाइमेट पर काफी गहरा असर डालती हैं। इसलिए, अब सिर्फ फिनिशिंग पर नहीं, बल्कि कंस्ट्रक्शन के पूरे लाइफसाइकिल पर पर्यावरण संबंधी जवाबदेही (environmental accountability) तय की जाएगी।
मलबे का प्रबंधन और सर्कुलरिटी के नियम
इस बदलाव को राष्ट्रीय नियम भी बल दे रहे हैं। निर्माण और विध्वंस (C&D) कचरा प्रबंधन नियमों (Waste Management Rules) में हुए नए बदलाव 1 अप्रैल, 2026 से लागू होंगे। इन नियमों के तहत, प्रोजेक्ट प्रोड्यूसर्स की ज़िम्मेदारी बढ़ाई गई है। उन्हें कचरा प्रबंधन की विस्तृत योजनाएं बनानी होंगी, कचरे को अलग करना होगा और सबसे महत्वपूर्ण, तय किए गए रीसाइक्लिंग लक्ष्यों (recycling targets) को पूरा करना होगा। साल 2030-31 तक, कंस्ट्रक्शन में इस्तेमाल होने वाले कम से कम 25% मटीरियल रीसाइकल्ड C&D मलबे से होने चाहिए। साथ ही, नियमों में 'एक्सटेंडेड प्रोड्यूसर रिस्पॉन्सिबिलिटी' (EPR) को भी शामिल किया गया है, जो कंपनियों को मलबे का ज़िम्मेदारी से प्रबंधन करने और रीसाइक्लिंग कोटे को पूरा करने के लिए बाध्य करता है। उदाहरण के लिए, 2025-26 में 25% रीसाइक्लिंग का लक्ष्य है, जिसे 2028-29 तक बढ़ाकर 100% कर दिया जाएगा। इन नए नियमों का मतलब है कि कंस्ट्रक्शन फर्मों को अपनी प्लानिंग और ऑपरेशंस में बड़े बदलाव करने होंगे, जो सीधे तौर पर उनके खर्चों को प्रभावित कर सकते हैं।
कर्नाटक में ग्रीन बिल्डिंग की बढ़त
यह कदम कर्नाटक के ग्रीन बिल्डिंग के क्षेत्र में पहले से हो रही प्रगति के साथ मेल खाता है। राज्य में पहले ही 1,500 से ज़्यादा रजिस्टर्ड ग्रीन बिल्डिंग प्रोजेक्ट्स हैं, जो कुल मिलाकर 1.1 बिलियन वर्ग फुट से ज़्यादा इलाके को कवर करते हैं। इस तरह, कर्नाटक देश में तीसरे स्थान पर है। इंडियन ग्रीन बिल्डिंग काउंसिल (IGBC) भी सस्टेनेबल प्रैक्टिसेस और नेट-ज़ीरो इनिशिएटिव्स को बढ़ावा दे रही है, जिससे ग्रीन कंस्ट्रक्शन का एक मज़बूत इकोसिस्टम तैयार हो रहा है।
सेक्टर पर असर और वैल्यूएशन
पूरे भारत में कंस्ट्रक्शन और रियल एस्टेट मार्केट में ज़बरदस्त ग्रोथ देखने को मिल रही है। 2026 में कंस्ट्रक्शन सेक्टर का अनुमानित वैल्यूएशन लगभग $790.92 बिलियन था, जिसके 2031 तक $1.1 ट्रिलियन तक पहुंचने की उम्मीद है। यह 6.87% के कंपाउंड एनुअल ग्रोथ रेट (CAGR) को दर्शाता है। रियल एस्टेट सेक्टर में भी भारी संस्थागत निवेश (institutional investment) आया है, जो 2025 में $10 बिलियन के पार चला गया। 2025 में भारतीय रियल एस्टेट में प्राइवेट इक्विटी ने $6.7 बिलियन का निवेश किया, जो पिछले साल के मुकाबले 59% ज़्यादा है। हालांकि, सेक्टर के वैल्यूएशन मेट्रिक्स, जैसे निफ्टी रियलिटी इंडेक्स का PE रेशियो 35.4 है, जो बाज़ार के अन्य सूचकांकों की तुलना में प्रीमियम दर्शाता है। इसका मतलब है कि निवेशक ग्रोथ की उम्मीदों को वैल्यूएशन में शामिल कर रहे हैं, लेकिन यह नतीजों के प्रदर्शन के प्रति संवेदनशीलता को भी उजागर करता है।
कंप्लायंस लागत, अवसर और ESG इंटीग्रेशन
ग्रीन कंस्ट्रक्शन प्रक्रियाओं के लिए बढ़ी हुई रेगुलेटरी मांगें प्रोजेक्ट की लागत और समय-सीमा को प्रभावित कर सकती हैं। जहां एक ओर ग्रीन-सर्टिफाइड प्रॉपर्टीज़ से 10-18% ज़्यादा रेंट मिल सकता है और ऑपरेशनल खर्चे 20-50% तक कम हो सकते हैं, वहीं दूसरी ओर, इन प्रैक्टिसेज को अपनाने की शुरुआती लागत (सर्टिफिकेशन फीस सहित) 3-10% ज़्यादा हो सकती है। एनवायर्नमेंटल, सोशल और गवर्नेंस (ESG) फैक्टर अब फाइनेंशियल मार्केट्स पर तेज़ी से असर डाल रहे हैं। जिन कंपनियों के ESG स्कोर अच्छे होते हैं, उनके स्पॉट मार्केट प्राइस अक्सर फ्यूचर मार्केट को लीड करते हैं, जबकि कम ESG स्कोर वाले स्टॉक्स के साथ इसका उल्टा होता है। यह बदलाव दिखाता है कि सस्टेनेबिलिटी अब सिर्फ कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी (CSR) नहीं, बल्कि एक ज़रूरी कैपिटल स्ट्रैटेजी बन गई है, जिसे ग्लोबल इन्वेस्टर्स की ओर से पर्यावरण-अनुकूल एसेट्स की मांग और ऑक्यूपायर के नेट-ज़ीरो कंप्लायंस की ज़रूरतों से बढ़ावा मिल रहा है। जो कंपनियां इन लाइफसाइकिल ज़रूरतों और कचरा प्रबंधन के नियमों को अपने ऑपरेशंस में जल्दी अपनाएंगी, उन्हें एक कॉम्पिटिटिव एडवांटेज मिल सकता है, जबकि अन्य को बढ़ी हुई कंप्लायंस लागत और संभावित दंड का सामना करना पड़ सकता है।