लग्जरी की होड़ में फंसे खरीदार
बेंगलुरु में आम लोगों की खरीदने की क्षमता और डेवलपर्स द्वारा पेश किए जा रहे घरों के बीच का अंतर तेज़ी से बढ़ा है। विश्लेषण से पता चलता है कि साल 2022 से, हर एक ₹80 लाख से कम कीमत वाले 'किफायती' घर के बदले डेवलपर्स ने इस स्तर से ऊपर पाँच प्रॉपर्टीज़ लॉन्च की हैं। ₹80 लाख से ₹3 करोड़ की रेंज में इन प्रीमियम प्रॉपर्टीज़ की भारी सप्लाई, बेंगलुरु की औसत प्रति व्यक्ति आय के बावजूद, कई निवासियों की परचेज़िंग पावर (Purchasing Power) से कहीं ज़्यादा है।
बढ़ता affordability गैप (Gape)
कर्नाटक इकोनॉमिक सर्वे (Karnataka Economic Survey) के अनुसार, बेंगलुरु में प्रति व्यक्ति औसत आय ₹7.6 लाख है। इसका मतलब है कि एक परिवार असल में लगभग ₹76 लाख का घर खरीद सकता है। लेकिन, हालिया आंकड़े बताते हैं कि केवल 33,831 यूनिट्स ही इस कीमत से नीचे आती हैं। ज़्यादातर नई कंस्ट्रक्शन प्रॉपर्टीज़ ₹80 लाख से ₹3 करोड़ के बीच हैं, और यहाँ तक कि 'किफायती' यूनिट्स भी ₹65-80 लाख के बीच में ही मिल रही हैं। इससे कम आय वाले परिवारों के पास बहुत कम विकल्प बचते हैं। इसके अलावा, 75% नई यूनिट्स अभी कंस्ट्रक्शन के अधीन हैं, जिससे लोगों को किराए और EMI दोनों का बोझ उठाना पड़ रहा है।
लोकेशन का चक्कर
घरों की लोकेशन भी इस affordability संकट को और गहरा कर रही है। ज़्यादा कीमत वाले घर ( ₹80 लाख से ₹1.2 करोड़ ) शहर के केंद्र से 8-16 किमी के दायरे में हैं, जहाँ बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर और कनेक्टिविटी मिलती है। इसके उलट, ₹80 लाख से कम कीमत वाले घर शहर के बाहरी इलाकों में 16 किमी रेडियस से भी परे धकेल दिए गए हैं। इन बाहरी इलाकों में अक्सर नगर निगम का पानी और सीवेज जैसी ज़रूरी सेवाओं की कमी होती है, साथ ही पब्लिक ट्रांसपोर्ट भी अस्त-व्यस्त है। ऐसे में, इन 'किफायती' घरों की छिपी हुई लागतों को जोड़ें तो ये असल में और भी महंगे साबित होते हैं।
डेवलपर्स की मंशा और समाधान की ज़रूरत
प्राइवेट डेवलपर्स अक्सर किफायती प्रोजेक्ट्स के लिए ज़्यादा शुरुआती लागत और डिमांड के जोखिम का हवाला देते हैं। इसकी तुलना में, लग्जरी सेगमेंट में उन्हें तेज़ी से रिटर्न और ज़्यादा मार्जिन मिलता है। यह प्रीमियम हाउसिंग पर फोकस आय और भौगोलिक असमानताओं को बढ़ा रहा है। एक्सपर्ट्स का कहना है कि बाज़ार की ताकतें अकेले इस असंतुलन को ठीक नहीं कर सकतीं। वे सरकारी हस्तक्षेप की मांग कर रहे हैं, जिसमें सरकारी प्रोजेक्ट्स, पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप (Public-Private Partnership) और नए नियम शामिल हों। हालाँकि, इन तरीकों को लागू करने और फंड करने में बड़ी चुनौतियाँ हैं।
आगे का रास्ता ज़ोनिंग (Zoning) और लैंड यूज़ (Land Use) नियमों जैसे मज़बूत उपायों की मांग करता है, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि डेवलपर्स किफायती घर बनाएँ। यदि कार्रवाई नहीं हुई, तो बेंगलुरु अपने ज़रूरी कर्मचारियों को घर देने में विफल होकर अपनी आर्थिक बढ़त खो सकता है।