दिल्ली-एनसीआर (Delhi-NCR) में सस्ते घरों की मांग और सप्लाई में बड़ा अंतर देखने को मिल रहा है। 2020 में जहां नए प्रोजेक्ट्स में 62% घर अफोर्डेबल सेगमेंट के होते थे, वहीं 2025 की पहली छमाही में यह आंकड़ा घटकर सिर्फ 5% रह गया है।
Detailed Coverage
क्यों घट रहा है अफोर्डेबल हाउसिंग का शेयर?
डेवलपर्स का फोकस अब लक्जरी (Luxury) प्रोजेक्ट्स पर शिफ्ट हो गया है, जहां से उन्हें 25% से 30% तक का मोटा मुनाफा मिल रहा है। वहीं, अफोर्डेबल हाउसिंग में यह मार्जिन सिर्फ 10% से 12% है। जमीन की बढ़ती कीमतें, कंस्ट्रक्शन कॉस्ट और सरकारी नियमों के चलते कम दाम वाले घरों में प्रॉफिट बनाए रखना मुश्किल हो गया है। इस वजह से Signature Global जैसे डेवलपर्स भी अब ₹3 करोड़ से ₹5 करोड़ के बीच के लग्जरी फ्लैट्स बनाने पर जोर दे रहे हैं।
मध्यम-वर्ग के खरीदारों की मुश्किल
इस बदलाव का सीधा असर मध्यम-वर्ग के खरीदारों पर पड़ रहा है। सरकार ने 2017 में अफोर्डेबल घरों की कीमत ₹40 लाख से ₹45 लाख तक तय की थी, जो आज की महंगाई और बढ़ती लागत के हिसाब से काफी पुरानी हो चुकी है। CREDAI जैसे रियल एस्टेट इंडस्ट्री बॉडीज का कहना है कि आज के समय में दिल्ली-एनसीआर जैसे शहरों में अफोर्डेबल घरों की कीमत ₹60 लाख से ₹85 लाख के बीच होनी चाहिए।
आगे क्या हो सकता है?
अफोर्डेबल हाउसिंग को फिर से पटरी पर लाने के लिए सरकार को नियमों में बदलाव करने होंगे। टैक्स में छूट, प्रधानमंत्री आवास योजना (PMAY-Urban 2.0) के तहत सब्सिडी बढ़ाना और नई इंफ्रास्ट्रक्चर कॉरिडॉर खोलना जैसे कदम उठाए जा सकते हैं। रियल एस्टेट रेगुलेटरी अथॉरिटी (RERA) के नियमों के मुताबिक, कीमत सीमा (Price Cap) को रिवाइज करना या कार्पेट एरिया के आधार पर परिभाषा बदलना अफोर्डेबल हाउसिंग को बढ़ावा देने के लिए जरूरी होगा।
