Tata Sons अब अपनी ऑपरेशनल स्ट्रक्चर में बड़ा बदलाव करने की योजना बना रही है। कंपनी दो बिजनेस यूनिट्स का मर्जर करेगी ताकि वह खुद को RBI के NBFC (Non-Banking Financial Company) नियमों के दायरे से बाहर निकाल सके। इस कदम का मकसद कंपनी को एक 'अनलिस्टेड होल्डिंग कंपनी' के तौर पर लचीला बनाए रखना है।
रीस्ट्रक्चरिंग का मास्टर प्लान
Tata Sons अपनी बिजनेस संरचना में बड़ा बदलाव करने की दिशा में आगे बढ़ रही है। कंपनी की योजना Tata Electronics Systems Solutions और Tata Consulting Engineers को सीधे पैरेंट कंपनी में मर्ज करने की है। यह पूरी कवायद इसलिए है ताकि कंपनी को भविष्य में 'Non-Banking Financial Company' या 'Core Investment Company' के सख्त रेगुलेटरी फ्रेमवर्क में न उलझना पड़े।
रेवेन्यू मॉडल और टारगेट
कंपनी का लक्ष्य 31 मार्च, 2026 तक खत्म होने वाले फाइनेंशियल ईयर में ₹105,043 करोड़ का ऑपरेटिंग रेवेन्यू हासिल करना है। रणनीति यह है कि ऑपरेटिंग इनकम को कुल कमाई का 64 प्रतिशत से ज्यादा रखा जाए। अगर ऐसा होता है, तो Tata Sons को एक 'पैसिव इन्वेस्टमेंट व्हीकल' के बजाय 'ऑपरेटिंग-कम-होल्डिंग फर्म' माना जाएगा।
रेगुलेटरी और फाइनेंशियल गणित
RBI के नियमों के मुताबिक, Core Investment Company के लिए वित्तीय संपत्तियों से होने वाली कमाई और ग्रुप फर्मों में निवेश पर कड़े प्रतिबंध होते हैं। नई योजना के तहत, ग्रुप कंपनियों में निवेश को ₹177,120 करोड़ तक सीमित रखा जाएगा। यह आंकड़ा कंपनी की कुल अनुमानित नेट एसेट ₹200,158 करोड़ के 90 प्रतिशत से कम है, जो इसे रेगुलेटरी दबाव से बचाने के लिए जरूरी है।
आगे क्या होगा?
इस प्लान को जुलाई 2025 में Sir Dorabji Tata Trust और Sir Ratan Tata Trust की मंजूरी मिल चुकी है। अब अंतिम मुहर के लिए RBI से 'नो-ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट' का इंतजार है। यदि मंजूरी मिलती है, तो Tata Sons अपना मौजूदा Core Investment Company रजिस्ट्रेशन सरेंडर कर देगी, जिससे उसे अपनी कारोबारी स्वतंत्रता बनाए रखने में मदद मिलेगी।
