पूर्व RBI गवर्नर Raghuram Rajan ने अमेरिकी फेडरल रिजर्व से ब्याज दरों पर कड़ा रुख अपनाने की मांग की है। उनका तर्क है कि मौजूदा आर्थिक परिस्थितियां पर्याप्त रूप से प्रतिबंधात्मक नहीं हैं, जिसका सीधा असर भारतीय बाजार और रुपये की चाल पर पड़ सकता है।
जैक्सन होल समिट में बड़ी चेतावनी
जैक्सन होल में आयोजित वार्षिक सेंट्रल बैंकिंग समिट के दौरान, पूर्व आरबीआई गवर्नर Raghuram Rajan ने अमेरिकी फेडरल रिजर्व को अधिक 'हॉकिश' (Hawkish) रुख अपनाने की सलाह दी है। फेड चेयर Kevin Warsh की पॉलिसी रिव्यू टास्क फोर्स का हिस्सा रहे Rajan का मानना है कि अमेरिका में वित्तीय स्थितियां अभी भी बहुत ढीली हैं। उन्होंने डेटा सेंटर्स में भारी निवेश और लगातार बढ़ते फिस्कल डेफिसिट का हवाला देते हुए कहा कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था उम्मीद के मुताबिक सुस्त नहीं हो रही है।
भारतीय बाजार पर क्या होगा असर?
इस बयान ने निवेशकों की चिंता बढ़ा दी है। फिलहाल भारतीय रुपया 95.50 के स्तर के आसपास ट्रेड कर रहा है। मई में आए निचले स्तरों से रिकवरी के बाद अब बाजार की नजरें RBI पर हैं। आरबीआई गवर्नर Sanjay Malhotra ने उम्मीद जताई है कि हालिया पूंजी जुटाने की पहलों से कम से कम $80 बिलियन का विदेशी निवेश (Foreign Inflows) भारत आ सकता है, जो रुपये के लिए एक बड़े सपोर्ट का काम करेगा।
निवेशकों के लिए जोखिम (Risks for Investors)
यदि अमेरिका में ब्याज दरें 'हायर-फॉर-लॉन्गर' बनी रहती हैं, तो इसका मतलब है कि भारत जैसे उभरते बाजारों में लिक्विडिटी का दबाव बढ़ सकता है। इससे विदेशों से कर्ज लेना महंगा हो जाएगा और निवेशक सुरक्षित अमेरिकी एसेट्स की ओर रुख कर सकते हैं, जिससे घरेलू बाजार में वोलैटिलिटी (Volatility) बढ़ सकती है।
अब बाजार की निगाहें 2026 के अंत में होने वाली फेडरल रिजर्व की पॉलिसी फैसलों पर टिकी हैं, जो वैश्विक स्तर पर उधार लेने की लागत और भारत में विदेशी संस्थागत पूंजी के प्रवाह को तय करेंगे।
