RBI की खामोशी से Tata Sons पर अनिश्चितता का घेरा
बाज़ार की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) Tata Sons के उस आवेदन पर कब फैसला लेगा, जिसमें कंपनी ने खुद को एक 'अपर लेयर' NBFC के तौर पर डी-रजिस्टर करने की गुहार लगाई है। RBI गवर्नर संजय मल्होत्रा ने इस पर टिप्पणी करने से बार-बार इनकार किया है, जिससे स्थिति और भी रहस्यमयी हो गई है। Tata Sons को 'अपर लेयर' NBFC के रूप में वर्गीकृत किया गया है, जिसके तहत उन्हें स्टॉक एक्सचेंजों पर लिस्ट होना अनिवार्य है। कंपनी ने सितंबर 2025 की लिस्टिंग की समय-सीमा को पार कर लिया है, लेकिन मार्च 2024 में ही डी-रजिस्ट्रेशन के लिए अर्जी दे दी थी। RBI का यह लंबा इंतज़ार यह संकेत दे सकता है कि वह बड़े, निजी समूहों के लिए रेगुलेटरी अपेक्षाओं को और कड़ा कर रहा है। 2018 के IL&FS संकट के बाद RBI ने NBFCs के लिए नियम सख्त किए थे, जिसमें 'अपर लेयर' के लिए कड़े गवर्नेंस और पारदर्शिता नियम शामिल हैं। Tata Sons के निजी बने रहने का भविष्य शेयरधारकों की सहमति और रेगुलेटर की मंजूरी पर निर्भर करेगा, जो फिलहाल अनिश्चित है।
भारत-अमेरिका व्यापार समझौता: फायदे और किसानों की चिंताएं
दूसरी ओर, 6 फरवरी, 2026 से प्रभावी हुए भारत-अमेरिका के बीच नए अंतरिम व्यापार समझौते ने भारतीय किसानों के बीच चिंता की लहर दौड़ा दी है। इस समझौते के तहत भारत अमेरिका से डिस्टिलर्स ड्राइड ग्रेन्स विद सोल्यूबल्स (DDGS), सोयाबीन तेल और कुछ फलों जैसे कृषि उत्पादों पर टैरिफ कम करेगा। हालांकि, किसान संगठनों का कहना है कि अमेरिका से आयातित, खासकर GM (जेनेटिकली मॉडिफाइड) मक्के से बने फीड इंग्रेडिएंट्स जैसे DDGS के लिए 'कैलिब्रेटेड' ओपनिंग से घरेलू सोयाबीन और मक्के की कीमतों पर ज़बरदस्त दबाव पड़ सकता है। ये फसलें पहले से ही न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) से कम पर बिक रही हैं। GM कंटेंट वाले आयात को लेकर नियामक आश्वासन के बावजूद, यह एक बड़ा विवाद का बिंदु बना हुआ है। वहीं, इस समझौते से भारतीय मसालों, चाय और कॉफी जैसे कृषि निर्यात को अमेरिका में जीरो-ड्यूटी एक्सेस मिलेगा, जो एक बड़ी राहत है। पर, पांच साल में अमेरिकी ऊर्जा, विमान और तकनीक में $500 बिलियन की खरीददारी की प्रतिबद्धता, बड़े आर्थिक पुनर्संरेखण का संकेत देती है।
बाज़ार पर असर और सेक्टर-वार प्रदर्शन
इस दोहरे घटनाक्रम का असर बाज़ार पर भी देखने को मिला। व्यापार समझौते की घोषणा के बाद निफ्टी 50 और BSE सेंसेक्स जैसे प्रमुख सूचकांकों में कुछ उछाल देखा गया। हालांकि, सेक्टर-वार प्रदर्शन अलग-अलग रहा। वैश्विक टेक बिकवाली के चलते निफ्टी IT इंडेक्स में लगभग 5.87% की गिरावट दर्ज की गई। दूसरी ओर, Tata Steel ने मजबूती दिखाई है और उसका शेयर अपने 52-हफ्ते के उच्च स्तर के करीब कारोबार कर रहा है। निफ्टी फाइनेंशियल सर्विसेज इंडेक्स स्थिर रहा, जो बैंकिंग और NBFC सेक्टर के लिए एक मजबूत आउटलुक बताता है। RBI द्वारा रेपो रेट को 5.25% पर अपरिवर्तित रखने और न्यूट्रल रुख बनाए रखने के फैसले ने भी आर्थिक स्थिरता में विश्वास जगाया है। RBI ने ₹1,000 करोड़ से कम एसेट्स वाले छोटे NBFCs को रजिस्ट्रेशन से छूट देने और ब्रांच विस्तार के नियमों को आसान बनाने जैसे कदम भी उठाए हैं।
आगे क्या?
Tata Sons के मामले में RBI की चुप्पी कंपनी के लिए ऑपरेशनल और स्ट्रेटेजिक अनिश्चितता पैदा कर रही है। 'अपर लेयर' NBFC होने के नाते लिस्टिंग ज़रूरी है, जिसकी समय-सीमा बीत चुकी है। रेगुलेटर की यह अनिश्चितता बड़े, निजी संस्थाओं पर सख्त निगरानी का संकेत दे सकती है, जिससे कंप्लायंस कॉस्ट बढ़ सकती है। भारतीय किसानों के लिए, MSP पर निर्भरता और अपर्याप्त खरीद तंत्र उन्हें व्यापार उदारीकरण से बढ़ी कीमतों की अस्थिरता के प्रति अधिक संवेदनशील बनाते हैं। अमेरिकी फीड आयात में की गई छूट, पोल्ट्री जैसे उद्योगों के लिए फायदेमंद होने के बावजूद, सीधे तौर पर घरेलू फसलों की कीमतों को प्रभावित कर सकती है। GM उत्पादों की उत्पत्ति को लेकर अस्पष्टता और व्यापार सौदे के 'अतिरिक्त उत्पाद' क्लॉज भविष्य में विवादों को जन्म दे सकते हैं। RBI की मॉनेटरी पॉलिसी कमिटी द्वारा रेपो रेट को 5.25% पर स्थिर रखने और न्यूट्रल रुख से पता चलता है कि वे मुद्रास्फीति को लेकर सहज हैं और FY26 के लिए 7.4% की मजबूत घरेलू विकास दर का अनुमान लगा रहे हैं। हालांकि, Tata Sons के रेगुलेटरी स्टेटस का समाधान एक महत्वपूर्ण ओवरहैंग बना हुआ है। व्यापार मोर्चे पर, अंतरिम समझौते ने एक नींव रखी है, लेकिन भारतीय कृषि क्षेत्र पर इसका दीर्घकालिक प्रभाव सरकार की आयात की अस्थिरता को प्रबंधित करने और घरेलू उत्पादकों की सुरक्षा करने की क्षमता पर निर्भर करेगा।