RBI के डिप्टी गवर्नर Swaminathan J ने बैंकों को चेतावनी दी है कि डिजिटल विस्तार के दौरान इंटरनल कंट्रोल्स को कमजोर न करें। उन्होंने साफ किया कि काम आउटसोर्स करने से जवाबदेही कम नहीं होती है और ग्राहकों की शिकायतों को सिस्टम के जोखिम पहचानने का जरिया बनाना चाहिए।
RBI ने बैंकों को साफ संदेश दिया है कि नई डिजिटल तकनीक अपनाने की होड़ में इंटरनल कंट्रोल्स से समझौता करना भारी पड़ सकता है। मुंबई में आयोजित एक समिट के दौरान RBI के डिप्टी गवर्नर Swaminathan J ने कहा कि ऑटोमेशन और आर्टिफीसियल इंटेलिजेंस (AI) कॉस्ट कटिंग में मदद जरूर कर सकते हैं, लेकिन ये oversight का विकल्प नहीं बन सकते।
आउटसोर्सिंग में किसकी जिम्मेदारी?
डिप्टी गवर्नर ने जोर दिया कि बैंकों का फिनटेक फर्मों और थर्ड-पार्टी प्लेटफॉर्म्स के साथ तालमेल बढ़ रहा है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि रेगुलेटरी जिम्मेदारी भी उन पर ट्रांसफर हो गई है। अगर कोई प्रोसेस फेल होती है या कंप्लायंस मानकों का उल्लंघन होता है, तो पूरी जवाबदेही लाइसेंस प्राप्त बैंक की ही होगी। बैंकों को अपने वेंडर्स की निगरानी भी उतनी ही सख्ती से करनी होगी, जितनी वे अपनी इंटरनल ऑपरेशंस की करते हैं।
रिस्क मैनेजमेंट और AI का तालमेल
AI-आधारित लेंडिंग और अंडरराइटिंग पर बोलते हुए रेगुलेटर ने कहा कि एल्गोरिदम डेटा को तेज प्रोसेस कर सकते हैं, लेकिन वे रिस्क को खुद-ब-खुद खत्म नहीं करते। बैंकों को डिजिटल सिस्टम अपनाते समय अपने रिस्क कंट्रोल फ्रेमवर्क को भी अपडेट करना होगा, ताकि नई तरह की चुनौतियों से निपटा जा सके।
शिकायतों से सीखें बैंक
RBI ने बैंकों के बोर्ड को सलाह दी कि वे कस्टमर की शिकायतों को केवल मामूली समस्या न मानें। इन शिकायतों को 'स्ट्रैटेजिक इंटेलिजेंस' के रूप में देखा जाना चाहिए। यह डेटा सिस्टम में छिपी उन खामियों को उजागर कर सकता है, जो आगे चलकर बड़े फ्रॉड या मिस-सेलिंग का कारण बन सकती हैं। निवेशकों के लिए यह एक संकेत है कि जो कंपनियां गवर्नेंस को प्राथमिकता नहीं देंगी, उन पर रेगुलेटरी सख्ती और पेनाल्टी का जोखिम अधिक रहेगा।
