Reserve Bank of India (RBI) ने बैंकिंग सिस्टम से अतिरिक्त कैश निकालने के लिए **$10 बिलियन** के करेंसी स्वैप (Currency Swaps) का सहारा लिया है। **$140 बिलियन** से ज्यादा के विदेशी निवेश के चलते सिस्टम में लिक्विडिटी रिकॉर्ड **₹11 लाख करोड़** तक पहुंच गई थी, जिसे काबू में रखने के लिए यह कदम उठाया गया है।
पिछले दो हफ्तों में, Reserve Bank of India (RBI) ने सेल-बाय करेंसी स्वैप ऑपरेशन्स के जरिए बैंकिंग सिस्टम से भारी मात्रा में कैश को बाहर निकाला है। केंद्रीय बैंक ने बैंकों को डॉलर बेचकर और बदले में रुपया वापस लेकर बाजार में फैली अत्यधिक नकदी को कम करने की कोशिश की है।
यह कदम क्यों जरूरी था?
बैंकिंग सिस्टम में लिक्विडिटी का आंकड़ा ₹11 लाख करोड़ के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया था। इसकी मुख्य वजह देश में आया $140 बिलियन से अधिक का विदेशी निवेश है। जरूरत से ज्यादा कैश होने से शॉर्ट-टर्म ब्याज दरों में उतार-चढ़ाव और महंगाई बढ़ने का खतरा बना रहता है, जिसे रोकने के लिए RBI का यह हस्तक्षेप महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
करेंसी स्वैप कैसे काम करता है?
इस प्रक्रिया में, RBI बैंकों को डॉलर बेचता है और एक निश्चित तारीख पर उन्हें वापस खरीदने का एग्रीमेंट करता है। इस दौरान, सिस्टम से रुपये की सप्लाई कम हो जाती है, जिससे रेपो रेट (Repo Rate) में बदलाव किए बिना ही मनी सप्लाई को नियंत्रित किया जा सकता है।
बाजार पर असर
इस कदम का सीधा असर डॉलर-रुपया फॉरवर्ड मार्केट पर दिख रहा है। 3-महीने और 6-महीने के फॉरवर्ड कॉन्ट्रैक्ट्स की दरों में तेजी देखी गई है। जानकारों का मानना है कि कैश रिजर्व रेशियो (CRR) बढ़ाने जैसे बड़े कदमों के बजाय, RBI का यह टारगेटेड तरीका बाजार के संतुलन के लिए ज्यादा प्रभावी है। निवेशकों के लिए अब आगे के लिक्विडिटी डेटा पर नजर रखना जरूरी होगा, क्योंकि केंद्रीय बैंक महंगाई और विकास के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रहा है।
