RBI ने कमर्शियल बैंकों के लिए ऑपरेशनल रिस्क कैपिटल गाइडलाइंस में बड़ा बदलाव किया है। अब 1 अप्रैल, 2027 से बैंक **5 साल** के लॉस डेटा के आधार पर अपनी कैपिटल जरूरतों का हिसाब लगा सकेंगे, जो पहले **10 साल** का था।
नियम में क्या बदला?
रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) ने स्पष्ट किया है कि बैंकों को अब अपनी इंटरनल लॉस हिस्ट्री के लिए 10 साल के बजाय सिर्फ 5 साल के डेटा की जरूरत होगी। यह कदम उन बैंकों के लिए बड़ी राहत है जो पिछले कई सालों से डिजिटल और ऑपरेशनल ट्रांसफॉर्मेशन के दौर से गुजर रहे हैं। इसके अलावा, RBI ने यह भी साफ किया है कि कैपिटल गणना करते समय 'नेट रिकवरी' (Net Recoveries) को भी ध्यान में रखा जाएगा। यानी, बैंक को जो नुकसान हुआ है, उसमें से वसूली गई रकम को घटाकर ही रिस्क प्रोफाइल का आकलन होगा।
निवेशकों पर क्या होगा असर?
यह बदलाव बैंकों की कैपिटल एफिशिएंसी के लिए गेम-चेंजर हो सकता है। जिन बैंकों का इंटरनल सिस्टम मजबूत है और जिनके ऑपरेशनल लॉस कम हैं, उन्हें अब अपनी पूंजी कम लॉक करनी पड़ सकती है। इसका सीधा फायदा यह होगा कि बैंक उस बची हुई पूंजी को कर्ज देने या अन्य बिजनेस विस्तार में इस्तेमाल कर सकेंगे।
वहीं, जिन बैंकों में सिस्टम फेलियर या फ्रॉड के मामले ज्यादा हैं, उन्हें अब अपनी कैपिटल को लेकर ज्यादा सतर्क रहना होगा। निवेशक अब बैंकों की आने वाली क्वार्टरली रिपोर्ट्स पर नजर रखें, क्योंकि मैनेजमेंट जल्द ही यह बता सकता है कि 2027 में इन नियमों के लागू होने के बाद उनकी बैलेंस शीट पर इसका क्या असर पड़ेगा। यह नया ढांचा अंतरराष्ट्रीय Basel III मानकों के काफी करीब है, जिससे भारतीय बैंकिंग सेक्टर की मजबूती बढ़ेगी।
