RBI ने Overseas Direct Investment (ODI) को लेकर कड़े नियम लागू कर दिए हैं। अब **$1 बिलियन** या नेट वर्थ के **4 गुना** से बड़े निवेश के लिए बैंकों को खुद स्वतंत्र वैल्यूएशन और स्ट्रेस टेस्ट करना होगा। इस कदम का मकसद विदेशी मुद्रा भंडार की सुरक्षा और रुपये में आ रही गिरावट को रोकना है।
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने बड़े पैमाने पर होने वाले ओवरसीज डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट (ODI) पर अपनी निगरानी बढ़ा दी है। नए फ्रेमवर्क के तहत, अब डोमेस्टिक बैंकों के लिए अनिवार्य कर दिया गया है कि वे किसी भी $1 बिलियन से ज्यादा की डील या ऐसी डील जो कंपनी की नेट वर्थ के 4 गुना से अधिक है, उसका स्वतंत्र वैल्यूएशन करें। पहले ऐसी डील्स के लिए थर्ड-पार्टी वैल्यूएशन रिपोर्ट्स पर निर्भर रहा जा सकता था, जिसे अब आरबीआई ने बदल दिया है।\n\nयह बदलाव ऐसे समय में आया है जब भारतीय रुपया डॉलर के मुकाबले दबाव में है और इस साल अब तक 5% से अधिक की गिरावट देख चुका है। बैंकों को अब खुद ड्यू डिलिजेंस करना होगा, ताकि अटकलबाजियों के चलते होने वाली कैपिटल की निकासी को रोका जा सके और फॉरेक्स रिजर्व पर दबाव न बढ़े।\n\n### कॉर्पोरेट्स के लिए क्या बदलेगा?\n\nबड़ी इंटरनेशनल डील्स करने वाली कंपनियों के लिए अब राह आसान नहीं होगी। नई प्रक्रिया के कारण:\n\n* समय की खपत: बैंकों द्वारा स्वतंत्र वैल्यूएशन और स्ट्रेस टेस्ट में ज्यादा समय लगेगा।\n* बढ़ती लागत: डील्स से जुड़ी कानूनी और डॉक्यूमेंटेशन फीस में इजाफा हो सकता है।\n\nRBI की नई गाइडलाइन्स में बैंकों को यह भी देखना होगा कि कंपनी भविष्य में आने वाले फाइनेंशियल झटकों को झेलने में कितनी सक्षम है। इसमें कंपनी का पिछला परफॉर्मेंस और लॉस सहने की क्षमता की जांच शामिल है। हालांकि आरबीआई ने पूंजी प्रवाह पर रोक नहीं लगाई है, लेकिन यह एक फिल्टर की तरह काम करेगा ताकि केवल वही प्रोजेक्ट्स आगे बढ़ें जो आर्थिक रूप से मजबूत हैं।\n\nनिवेशकों को अब उन कंपनियों पर नजर रखने की जरूरत है जिनका विदेशी कारोबार बड़ा है, क्योंकि इन कड़े नियमों के कारण उनके प्रोजेक्ट्स में देरी या कैपिटल खर्च की रणनीति में बदलाव आ सकता है।
