RBI का बड़ा फैसला: 2027 से बदलेंगे लोन रिकवरी के नियम, इन बातों का रखें ध्यान

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AuthorAditya Rao|Published at:
RBI का बड़ा फैसला: 2027 से बदलेंगे लोन रिकवरी के नियम, इन बातों का रखें ध्यान

रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) ने लोन वसूली के तरीकों को लेकर बड़ा कदम उठाया है। 1 जनवरी 2027 से लागू होने वाले नए नियमों के तहत बैंकों और NBFCs को सख्त प्रोटोकॉल का पालन करना होगा, जिससे कर्जदारों के अधिकारों की रक्षा होगी और वसूली प्रक्रिया पारदर्शी बनेगी।

कर्ज़ वसूली में RBI का बड़ा बदलाव

भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने कर्ज वसूली के नियमों में एक बड़ा बदलाव करने का ऐलान किया है। 6 अगस्त 2026 को जारी किए गए नौ नए सर्कुलर के ज़रिए, RBI अब बैंकों, नॉन-बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनियों (NBFCs) और अन्य लोन देने वाली संस्थाओं पर वसूली की प्रक्रियाओं को लेकर सख्त निगरानी रखेगा। ये नए नियम 1 जनवरी 2027 से लागू होंगे और इनका मकसद लोन रिकवरी की प्रक्रिया को प्रोफेशनल बनाना और कर्जदारों के हक़ की रक्षा करना है।

क्या हैं नए नियम?

नई गाइडलाइंस के तहत, वसूली से जुड़ा कोई भी कम्युनिकेशन, चाहे वो फोन कॉल हो या मैसेज, अब सुबह 8 बजे से शाम 7 बजे के बीच ही किया जा सकेगा। पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए, सभी रिकवरी कॉल्स को रिकॉर्ड करना भी अनिवार्य होगा। वसूली एजेंटों द्वारा घर या ऑफिस का दौरा करने से पहले कर्जदार को सूचित करना होगा, और एजेंटों के पास उचित पहचान पत्र और अधिकार पत्र होना ज़रूरी है। इसके अलावा, नियमों में खास और दस्तावेज़ों के ज़रिए साबित किए जा सकने वाले मामलों को छोड़कर, इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस को दूर से लॉक करने पर भी रोक लगा दी गई है।

निवेशकों पर क्या होगा असर?

इन नियमों का असर सीधा बैंकों और NBFCs के ऑपरेशनल कॉस्ट पर पड़ सकता है। संस्थाओं को कॉल रिकॉर्डिंग सिस्टम जैसे नए डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर में निवेश करना होगा और अपनी शिकायत निवारण टीमों का विस्तार करना पड़ सकता है। स्टाफ और थर्ड-पार्टी रिकवरी एजेंसियों को नए नियमों के अनुसार प्रशिक्षित करने का खर्च भी जुड़ेगा। सबसे बड़ी बात यह है कि अब बैंक और NBFCs अपने द्वारा हायर किए गए थर्ड-पार्टी रिकवरी एजेंटों के गलत कामों के लिए पूरी तरह से ज़िम्मेदार होंगे।

कलेक्शन एफिशिएंसी पर भी नज़र

वसूली की आक्रामक रणनीतियों से हटकर नए तरीके अपनाने में कर्ज वसूली की एफिशिएंसी पर भी असर पड़ सकता है। जो संस्थान स्ट्रेस्ड एसेट्स, खासकर अनसिक्योर्ड लोन जैसे माइक्रोफाइनेंस या पर्सनल लोन के लिए ज़्यादा इंटेंसिव कलेक्शन पर निर्भर करते हैं, उन्हें चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। अगर वसूली की दरें कम होती हैं, तो इससे प्रॉफिट मार्जिन पर दबाव आ सकता है या बैड लोन के लिए ज़्यादा प्रोविज़न की ज़रूरत पड़ सकती है। हालांकि, लम्बे समय में यह कदम कानूनी और रेपुटेशनल रिस्क को कम करेगा, जिससे बिज़नेस के ज़्यादा सस्टेनेबल और ट्रांसपेरेंट होने की उम्मीद है।

निवेशक आने वाली तिमाही नतीजों में मैनेजमेंट कमेंट्री पर नज़र रख सकते हैं कि वे इन बदलावों के लिए कैसे तैयारी कर रहे हैं। जनवरी 2027 की डेडलाइन से पहले, रिटेल-हैवी लेंडर्स के कॉस्ट-टू-इनकम रेशियो पर पड़ने वाले प्रभाव और कलेक्शन डेटा में आने वाले बदलावों पर नज़र रखना महत्वपूर्ण होगा।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.