Reserve Bank of India (RBI) ने रुपये में आ रही गिरावट और उतार-चढ़ाव को थामने के लिए Forex Derivatives के नियमों को कड़ा कर दिया है। अब बड़े कॉन्ट्रैक्ट्स पर **20%** का कैश रिजर्व रखना अनिवार्य होगा और ट्रांजैक्शन लिमिट भी घटा दी गई है।
डेरिवेटिव ट्रेडिंग की बदल गई सीमाएं
RBI ने स्पेकुलेटिव ट्रेडिंग को रोकने के लिए बड़ा कदम उठाया है। अब बिना कमर्शियल एक्सपोजर के डेरिवेटिव ट्रांजैक्शन की लिमिट को $100 मिलियन से घटाकर सीधे $5 मिलियन कर दिया गया है। इसका मतलब है कि अब ट्रेडर्स को अपनी हर ट्रेड के पीछे एक ठोस वजह बतानी होगी। इसके अलावा, RBI ने अब कैंसिल किए गए रुपी-लिंक्ड फॉरेक्स कॉन्ट्रैक्ट्स को फिर से बुक (Rebooking) करने पर भी रोक लगा दी है।
फॉरेन एक्सचेंज रिस्क रिजर्व का बोझ
केंद्रीय बैंक ने 'Foreign Exchange Risk Reserve' (FERR) पेश किया है। अब ऑथराइज्ड डीलर्स को $2 मिलियन से ज्यादा के उन डेरिवेटिव कॉन्ट्रैक्ट्स पर 20% का कैश रिजर्व आरबीआई के पास रखना होगा, जो करंट अकाउंट एक्सपोजर को हेज करते हैं। इससे बैंकों की लिक्विडिटी पर असर पड़ेगा और हेजिंग की लागत बढ़ जाएगी। इसका सीधा असर इलेक्ट्रॉनिक्स, मैन्युफैक्चरिंग और केमिकल कंपनियों के मार्जिन पर दिख सकता है जो इंपोर्ट पर ज्यादा निर्भर हैं।
ऑयल मार्केटिंग कंपनियों के लिए राहत
बाजार में डॉलर की मांग को संतुलित रखने के लिए, RBI ने 12 अक्टूबर, 2026 से राज्य संचालित ऑयल मार्केटिंग कंपनियों (OMCs) के लिए एक विशेष डॉलर-सेलिंग विंडो खोलने का फैसला किया है। इससे Indian Oil Corporation (IOC), Hindustan Petroleum (HPCL) और Bharat Petroleum (BPCL) जैसी कंपनियों को सीधे डॉलर मिल सकेंगे, जिससे स्पॉट मार्केट में अचानक हलचल नहीं मचेगी।
निवेशकों के लिए क्या है संकेत?
आने वाले समय में बैंकिंग सेक्टर की बैलेंस शीट और इन कंपनियों के तिमाही नतीजों पर नजर रखना जरूरी होगा। यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या कंपनियां इस बढ़ी हुई हेजिंग लागत को खुद झेलती हैं या उसका बोझ ग्राहकों पर डालती हैं। RBI का यह रुख साफ है कि वह स्पेकुलेशन के बजाय बाजार में स्टेबिलिटी को प्राथमिकता दे रहा है।
