Reserve Bank of India (RBI) इन दिनों बैंकिंग सिस्टम में भारी लिक्विडिटी सरप्लस से जूझ रहा है। विदेशी मुद्रा के रिकॉर्ड **$136 बिलियन** इनफ्लो के कारण ओवरनाइट इंटरेस्ट रेट्स बेंचमार्क से नीचे गिर गए हैं, जिसे कंट्रोल करने के लिए RBI ने बॉन्ड सेल और रिवर्स रेपो ऑक्शन का सहारा लिया है। निवेशकों की नजर अब **5-7 अक्टूबर** को होने वाली MPC मीटिंग पर है।
बाजार में कैश की बाढ़ क्यों?
देश के बैंकिंग सिस्टम में इस समय भारी मात्रा में कैश उपलब्ध है। ताजा आंकड़ों के मुताबिक, सिस्टम में करीब $136 बिलियन की विदेशी मुद्रा आई है, जिसमें से $127 बिलियन अकेले FCNR(B) प्रोग्राम से मिले हैं जो 30 सितंबर, 2026 को खत्म हुआ। इस वजह से भारत का फॉरेक्स रिजर्व $786 बिलियन के ऐतिहासिक स्तर पर पहुंच गया है।
RBI की दोतरफा रणनीति
जब सिस्टम में जरूरत से ज्यादा कैश होता है, तो ओवरनाइट मनी मार्केट रेट्स रेपो रेट से नीचे गिर जाते हैं। इसे रोकने के लिए RBI दो तरीके अपना रहा है:
- VRRR ऑक्शन: इसके जरिए सिस्टम से अस्थायी तौर पर कैश सोखा जा रहा है।
- OMO (Open Market Operations): सरकारी सिक्योरिटीज बेचकर सिस्टम से लंबे समय के लिए लिक्विडिटी को कम किया जा रहा है।
क्या दरें बढ़ेंगी?
मार्केट में चर्चा है कि अगर लिक्विडिटी कंट्रोल नहीं हुई, तो 5-7 अक्टूबर को होने वाली MPC मीटिंग में RBI 25 बेसिस पॉइंट की ब्याज दर बढ़ोतरी कर सकता है, जिससे रेपो रेट 5.50% पर पहुंच सकता है। हालांकि, महंगाई और खाने-पीने की चीजों की बढ़ती कीमतों ने स्थिति को और चुनौतीपूर्ण बना दिया है। निवेशकों को सलाह है कि वे केंद्रीय बैंक के कमेंट्री पर कड़ी नजर रखें, क्योंकि सख्त मॉनेटरी पॉलिसी का असर सरकारी बॉन्ड यील्ड और मार्केट वोलेटिलिटी पर पड़ सकता है।
