RBI बैंकिंग सिस्टम में मौजूद **₹11 लाख करोड़** की भारी-भरकम लिक्विडिटी को सोखने के लिए डॉलर-रुपया सेल-बाय स्वैप का इस्तेमाल कर रहा है। इससे हालांकि मनी मार्केट में स्थिरता आई है, लेकिन डॉलर फॉरवर्ड प्रीमियम बढ़ने से भारतीय कंपनियों के लिए हेजिंग (Hedging) लागत महंगी हो गई है।
लिक्विडिटी मैनेजमेंट की चुनौती
भारतीय बैंकिंग सिस्टम में इस समय ₹11 लाख करोड़ का सरप्लस कैश मौजूद है। यह स्थिति $136 बिलियन से अधिक के फॉरेन-करेंसी डिपॉजिट्स के कारण पैदा हुई है, जो मुख्य रूप से FCNR(B) स्पेशल स्वैप विंडो के जरिए आए थे। बैंकिंग सिस्टम के 'वेटेड एवरेज कॉल रेट' को रेपो रेट के साथ तालमेल बिठाने के लिए रिजर्व बैंक अब आक्रामक तरीके से डॉलर-रुपया सेल-बाय स्वैप का इस्तेमाल कर रहा है ताकि सिस्टम से अतिरिक्त रुपया लिक्विडिटी निकाली जा सके।
हेजिंग लागत में उछाल
RBI की इस रणनीति का सीधा असर डॉलर फॉरवर्ड प्रीमियम पर दिखा है, जो भविष्य के पेमेंट के लिए डॉलर सुरक्षित करने की लागत को दर्शाता है। जब RBI स्पॉट मार्केट में डॉलर बेचकर भविष्य के लिए उन्हें वापस खरीदने का एग्रीमेंट करता है, तो बाजार से रुपया तो निकल जाता है, लेकिन फॉरवर्ड मार्केट का खर्च बढ़ जाता है। इसका खामियाजा उन कंपनियों को उठाना पड़ रहा है जो बड़े पैमाने पर इंपोर्ट करती हैं, जैसे ऑयल रिफाइनर्स, इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरर्स और केमिकल कंपनियां। अगर ये लागतें ऊंची बनी रहीं, तो डॉलर-डिनॉमिनेटेड पेमेंट करने वाली कंपनियों के नेट प्रॉफिट पर दबाव आना तय है।
आगे क्या देखें?
निवेशकों के लिए RBI का अगला कदम देखना महत्वपूर्ण होगा। हालांकि FCNR(B) विंडो बंद हो चुकी है, लेकिन 31 दिसंबर 2026 तक ECBs (एक्सटर्नल कमर्शियल बॉरोइंग्स) की विंडो खुली है, जो लिक्विडिटी को बनाए रख सकती है। अब मार्केट की नजर इस बात पर है कि क्या RBI अपने लिक्विडिटी टूल्स में बदलाव कर वेरिएबल-रेट रिवर्स रेपो (VRRR) ऑक्शन की तरफ रुख करता है। बढ़ती रुपये की अस्थिरता और महंगी हेजिंग लागत आने वाली तिमाहियों में इंपोर्ट-इंटेंसिव कंपनियों के लिए मुख्य रिस्क फैक्टर हो सकते हैं।
