रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) ने Account Aggregator इकोसिस्टम के लिए एक यूनिफाइड फीस स्ट्रक्चर लागू करने का ऐलान किया है, जो 1 नवंबर, 2026 से प्रभावी होगा। इसके जरिए व्यक्तिगत कॉन्ट्रैक्ट्स की जगह एक मानक मूल्य निर्धारण प्रणाली आएगी, जिससे डेटा शेयरिंग का पूरा ढांचा और भी मजबूत होगा।
रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) ने देश के Account Aggregator इकोसिस्टम के बिजनेस मॉडल में एक बड़ा बदलाव करने की तैयारी कर ली है। 1 नवंबर, 2026 से यह नया नियम लागू हो जाएगा, जिसके तहत बैंकों और टेक्नोलॉजी प्रोवाइडर्स के बीच चल रहे पुराने और अलग-अलग कॉन्ट्रैक्ट्स को खत्म कर एक सिंगल, अनिवार्य फीस स्ट्रक्चर लाया जाएगा। इस बदलाव का मुख्य उद्देश्य डिजिटल फाइनेंशियल इंफ्रास्ट्रक्चर को लंबे समय के लिए सस्टेनेबल बनाना है।
कैसे काम करेगा नया फीस मॉडल?
नए फ्रेमवर्क के मुताबिक, जो फाइनेंशियल इंस्टीट्यूशंस ग्राहकों का डेटा मांगेंगे (Financial Information Users), उन्हें एक यूनिवर्सल फीस चुकानी होगी। यह कमाई डेटा प्रोवाइडर्स, Account Aggregators और इस पूरे इकोसिस्टम की निगरानी करने वाली संस्था Sahamati के बीच साझा की जाएगी। इस कदम से बैंकों और फाइनेंशियल फर्मों को बेहतर डेटा सर्विस देने के लिए प्रोत्साहन मिलेगा। इस फंड का इस्तेमाल साइबर सिक्योरिटी प्रोटोकॉल, टू-फैक्टर ऑथेंटिकेशन और कंसेंट मैनेजमेंट टूल्स जैसे अहम बैकएंड इंफ्रास्ट्रक्चर को और मजबूत करने में किया जाएगा।
प्लेटफॉर्म इंटरऑपरेबिलिटी का फायदा
अक्टूबर में हुई घोषणा के अनुसार, 31 दिसंबर, 2026 तक RBI ने प्लेटफॉर्म इंटरऑपरेबिलिटी को भी अनिवार्य कर दिया है। इसका सीधा मतलब यह है कि ग्राहक अब किसी एक पसंदीदा Account Aggregator के जरिए अपने फाइनेंशियल डेटा को मैनेज कर पाएंगे, उन्हें अलग-अलग प्लेटफॉर्म्स पर भटकने की जरूरत नहीं होगी। यह तकनीकी बाधाओं को दूर करेगा और सेवाओं के बीच स्विच करना आसान बनाएगा।
ग्राहकों पर क्या असर?
सबसे अहम बात यह है कि इन सभी बदलावों के बावजूद, आम ग्राहकों को इन सेवाओं के लिए कोई भी सीधा शुल्क नहीं देना होगा। हालांकि, बैंकों, लेंडर्स और फिनटेक कंपनियों के लिए अपनी इंटरनल सिस्टम को अपग्रेड करना एक बड़ी चुनौती होगी, ताकि वे नए सिक्योरिटी और प्रोटोकॉल के साथ तालमेल बिठा सकें।
