RBI की डिप्टी गवर्नर पूनम गुप्ता ने कहा है कि उभरते बाजारों को विदेशी पूंजी पर निर्भरता कम करनी होगी। डॉलर के मुकाबले रुपया **95.20** के स्तर के करीब है और इस साल इसमें **5.5%** की कमजोरी आई है।
RBI ने अब अपनी रणनीति बदल ली है। सेंट्रल बैंक का मुख्य जोर अब विदेशी अस्थिर पूंजी के बजाय घरेलू आर्थिक मजबूती पर है। डिप्टी गवर्नर पूनम गुप्ता ने हाल ही में चेतावनी दी कि भारत जैसे उभरते बाजारों को विदेशी फंड्स के उतार-चढ़ाव से सतर्क रहने की जरूरत है। जब विदेशी निवेशक अचानक पैसा निकालते हैं, तो केंद्रीय बैंकों को अपनी फॉरेक्स रिजर्व (Forex Reserves) खर्च करके करेंसी को बचाना पड़ता है।\n\n### रुपये की चाल और बाजार का गणित\n\nइस साल रुपया लगभग 5.5% टूट चुका है। हालांकि यह 95.20 के स्तर पर थोड़ा संभला है, लेकिन भारतीय बाजार अभी भी ग्लोबल हलचल के प्रति काफी संवेदनशील हैं। रुपये की कमजोरी एक दोधारी तलवार है—इससे IT और फार्मा कंपनियों को एक्सपोर्ट से फायदा होता है, लेकिन कच्चा माल और एनर्जी इंपोर्ट करने वाली कंपनियों के लिए खर्च बढ़ जाता है।\n\n### क्या है RBI का 'टू-प्रॉन्ग' प्लान?\n\n1. NRI निवेश को बढ़ावा: RBI चाहता है कि NRI अपना पैसा भारत में रखें, क्योंकि यह फंड 'स्टिकी' (Sticky) या स्टेबल होता है और बाजार के डर के समय जल्दी बाहर नहीं निकलता।\n\n2. सट्टेबाजी पर लगाम: सेंट्रल बैंक रुपये में होने वाली सट्टेबाजी (Speculative Betting) को रोकने के लिए सख्त कदम उठा रहा है। शॉर्ट-सेलिंग को महंगा और मुश्किल बनाया जा रहा है ताकि करेंसी में अचानक आने वाले उतार-चढ़ाव पर लगाम लग सके।\n\nनिवेशकों को अब RBI के फॉरेक्स रिजर्व डेटा और मॉनेटरी पॉलिसी की बैठकों पर कड़ी नजर रखनी होगी, क्योंकि यही भविष्य के आर्थिक संकेतों को तय करेंगे।
