Reserve Bank of India (RBI) ने बैंकिंग सिस्टम से **₹1 ट्रिलियन** की लिक्विडिटी को बाहर निकाला है। एक दशक में यह सबसे बड़ी निकासी है, जिसका मकसद बाजार में मौजूद अतिरिक्त नकदी को सोखना है। निवेशकों को अब बढ़ती बॉन्ड यील्ड और टाइट लिक्विडिटी के लिए तैयार रहना चाहिए।
लिक्विडिटी पर RBI का कड़ा प्रहार
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने चालू फाइनेंशियल ईयर में बैंकिंग सिस्टम से भारी नकदी निकालने का कदम उठाया है। ₹1 ट्रिलियन के बॉन्ड बेचकर की गई यह कार्रवाई पिछले 10 साल की सबसे बड़ी लिक्विडिटी कॉन्ट्रैक्शन है। इस कदम का मुख्य उद्देश्य मनी सप्लाई को बैलेंस करना है ताकि शॉर्ट-टर्म इंटरेस्ट रेट्स केंद्रीय बैंक की पॉलिसी के अनुरूप बने रहें।
क्यों पड़ी ये जरूरत?
सिस्टम में यह अतिरिक्त नकदी डॉलर के इनफ्लो की वजह से आई थी। जब RBI ने रुपये को स्थिर रखने के लिए डॉलर रिजर्व मैनेज किए, तो सिस्टम में भारी मात्रा में रुपया लिक्विडिटी इंजेक्ट हो गई। इससे ओवरनाइट इंटरेस्ट रेट्स, RBI के Repo Rate से भी नीचे चले गए थे। महंगाई को काबू में रखने और मॉनेटरी डिसिप्लिन के लिए RBI ने 'ओपन मार्केट ऑपरेशंस' का सहारा लिया और कमर्शियल बैंकों को सरकारी बॉन्ड बेचकर कैश सोख लिया।
बॉन्ड यील्ड और मार्केट पर असर
दबाव सिर्फ RBI की तरफ से नहीं है। सरकार भी अपने उधारी कैलेंडर को बढ़ा रही है, जिसमें 15-साल, 30-साल और 40-साल के लंबे टेन्योर वाले बॉन्ड शामिल हैं। फाइनेंस की भाषा में, जब बॉन्ड की सप्लाई बढ़ती है, तो बॉन्ड की कीमतें गिरती हैं और यील्ड (Yield) ऊपर जाती है। इस माहौल में निवेशकों के लिए कम समय में मुनाफे की उम्मीद कम है।
निवेशकों के लिए चेतावनी
जब सिस्टम से नकदी कम होती है, तो कर्ज लेना महंगा हो जाता है। बैंकों की कॉस्ट ऑफ फंड्स बढ़ सकती है, जिसका असर लोन की दरों पर दिख सकता है। इसके अलावा, इक्विटी मार्केट के लिए भी यह एक चिंता का विषय है, क्योंकि बॉन्ड यील्ड का बढ़ना स्टॉक वैल्युएशन पर दबाव डालता है।
आगे चलकर, बाजार मानकर चल रहा है कि दिसंबर तक RBI ₹1 ट्रिलियन से ₹1.5 ट्रिलियन तक के और बॉन्ड बेच सकता है। निवेशकों को अब बैंकिंग सिस्टम लिक्विडिटी डेटा, बॉन्ड ऑक्शन शेड्यूल और Cash Reserve Ratio (CRR) से जुड़े अपडेट्स पर पैनी नजर रखनी चाहिए।
