RBI ने रुपये की चाल को स्थिर रखने के लिए बाजार में करीब **$8 बिलियन** के डॉलर बेचे हैं। रिकॉर्ड विदेशी मुद्रा भंडार के बीच अब सेंट्रल बैंक का मुख्य फोकस डॉलर इनफ्लो से बाजार में बढ़ी एक्स्ट्रा लिक्विडिटी को मैनेज करने पर है।
बाजार में RBI का हस्तक्षेप
रुपये में बढ़ते उतार-चढ़ाव को थामने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने करेंसी मार्केट में बड़ा कदम उठाया है। बैंक ने करीब $8 बिलियन की डॉलर सेलिंग की है। यह फैसला तब आया है जब रुपया हाल ही में दो महीने की ऊंचाई यानी 94.3 से 94.5 के दायरे में ट्रेड कर रहा था। इस कदम का मकसद एक्सचेंज रेट में होने वाली तेज हलचल को रोकना है।
रिकॉर्ड रिजर्व का सच और चुनौती
अगस्त 2026 के अंत तक भारत का विदेशी मुद्रा भंडार $740.8 बिलियन के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है। इस वृद्धि के पीछे सेंट्रल बैंक की स्पेशल FCNR(B) डिपॉजिट स्कीम का बड़ा हाथ है, जिसने अकेले $136 बिलियन से अधिक का फंड जुटाया है। यह भंडार जहां देश के लिए एक सुरक्षा कवच है, वहीं बाजार में रुपये की बढ़ती लिक्विडिटी को संभालना RBI के लिए एक नई चुनौती बन गया है।
लिक्विडिटी मैनेज करने का तरीका
जब RBI डॉलर खरीदकर रिजर्व बनाता है, तो बाजार में उतनी ही मात्रा में रुपया आता है। अगर यह पैसा बैंकिंग सिस्टम में बना रहे, तो शॉर्ट-टर्म ब्याज दरें गिर सकती हैं और महंगाई का खतरा बढ़ सकता है। इसे रोकने के लिए RBI अब Variable Rate Reverse Repo (VRRR) ऑक्शन जैसे टूल्स का इस्तेमाल कर रहा है ताकि मार्केट से एक्स्ट्रा कैश को सोखा जा सके।
निवेशकों के लिए आगे का रिस्क
निवेशकों की नजर अब RBI की 'फॉरवर्ड फॉरेन एक्सचेंज लायबिलिटीज' पर है। जानकारों का कहना है कि अग्रेसिव स्वैप इंटरवेंशन की वजह से ये लायबिलिटीज बढ़ी हैं, जो भविष्य में सेंट्रल बैंक की पॉलिसी फ्लेक्सिबिलिटी को सीमित कर सकती हैं। वहीं, आने वाले समय में Brent Crude Oil की बढ़ती कीमतें और US Federal Reserve के ब्याज दरों से जुड़े फैसले रुपये की चाल पर बड़ा असर डाल सकते हैं।
