भारतीय रुपया लगातार दबाव में है। इसी को देखते हुए Reserve Bank of India (RBI) ने गुरुवार को विदेशी मुद्रा बाजार (Forex Market) में दखल दिया है और सरकारी बैंकों के जरिए डॉलर की बिकवाली की है।
गुरुवार को फॉरेक्स मार्केट में हलचल तब बढ़ गई जब Reserve Bank of India (RBI) ने सरकारी बैंकों के माध्यम से अमेरिकी डॉलर की सप्लाई बढ़ा दी। उस समय रुपया डॉलर के मुकाबले 84.24 के स्तर के आसपास ट्रेड कर रहा था। RBI का यह कदम बाजार में आई अचानक गिरावट और अस्थिरता को रोकने के लिए एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा था।
RBI का मकसद क्या है?
सेंट्रल बैंक का मुख्य उद्देश्य रुपये के ट्रेंड को पूरी तरह बदलना नहीं है, बल्कि बाजार में आने वाली तेज और सट्टेबाजी वाली चालों (speculative moves) को शांत करना है। जब इंट्रा-डे में दबाव बढ़ता है, तो RBI लिक्विडिटी के जरिए हस्तक्षेप करता है ताकि मार्केट में स्थिरता बनी रहे। यह RBI का पुराना तरीका है, जिससे वे मार्केट के सेंटीमेंट को काबू में रखते हैं।
क्यों है यह चुनौती?
RBI के सामने एक बड़ी चुनौती है—संतुलन बनाना। अगर रुपया ज्यादा कमजोर होता है, तो इंपोर्ट महंगा हो जाता है, जिससे देश में महंगाई (inflation) बढ़ने का खतरा रहता है। वहीं, दूसरी ओर एक्सपोर्टर्स को कमजोर रुपये से फायदा होता है। इन दोनों के बीच तालमेल बिठाते हुए, RBI ने साफ कर दिया है कि वे रुपये को बहुत ज्यादा गिरने नहीं देंगे।
ग्लोबल स्तर पर मजबूत होते डॉलर के कारण भारतीय रुपये पर दबाव बना हुआ है। अब ट्रेडर्स की नजर RBI के अगले फैसलों, फॉरेक्स रिजर्व के डेटा और ग्लोबल संकेतों पर टिकी है। निवेशकों को यह समझना होगा कि RBI का लक्ष्य किसी फिक्स्ड रेट को बनाए रखना नहीं, बल्कि मार्केट की उम्मीदों को स्थिर रखना है।
