भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की सब्सिडियरी BRBNMPL ने बैंक नोट छापने के लिए खास तरह के पॉलीमर सब्सट्रेट की सप्लाई के लिए ग्लोबल बिड मंगाई है। यह कदम प्लास्टिक करेंसी की ओर बढ़ने की चर्चाओं के बीच आया है, जो कॉटन-आधारित नोटों की तुलना में ज्यादा टिकाऊ मानी जाती है। शुरुआती टेंडर में **68,000** रीम मैटेरियल की जरूरत बताई गई है, जो भारत में करेंसी प्रोडक्शन के तरीकों में बड़े बदलाव का संकेत है।
क्यों हो रही है प्लास्टिक करेंसी की बात?
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) देश में पॉलीमर-आधारित करेंसी लाने की दिशा में एक बड़ा कदम उठा रहा है। RBI की नोट छापने वाली संस्था, Bharatiya Reserve Bank Note Mudran (P) Ltd (BRBNMPL), ने खास पॉलीमर सब्सट्रेट की खरीद के लिए वैश्विक स्तर पर रुचि (EoI) मांगी है। यह मटेरियल, जिसे बायएक्सियली ओरिएंटेड पॉलीप्रोपाइलीन (BOPP) कहते हैं, प्लास्टिक के नोटों का आधार बनता है। इन नोटों को पारंपरिक कागजी नोटों की तुलना में ज्यादा टिकाऊ और जालसाजी (counterfeit) के लिए मुश्किल माना जाता है।
टेंडर की डिटेल्स और शर्तें
इस टेंडर के तहत, शुरुआत में 68,000 रीम ओपेसिफाइड पॉलीमर सब्सट्रेट की सप्लाई मांगी गई है, जिसमें हर रीम में 500 शीट होंगी। यह सप्लाई अलग-अलग डिनॉमिनेशन (मूल्य वर्गों) के लिए होगी। क्वालिटी और विश्वसनीयता सुनिश्चित करने के लिए, BRBNMPL ने सप्लायर्स के लिए सख्त पात्रता मानदंड तय किए हैं। बोली लगाने वालों के पास 31 मार्च, 2026 तक केंद्रीय बैंकों या अधिकृत नोट छपाई संस्थानों को इसी तरह के सुरक्षा-संवर्धित सब्सट्रेट की सप्लाई का कम से कम तीन साल का अनुभव होना चाहिए।
इसके अलावा, टेंडर में कंपनियों को अपनी उत्पादन क्षमता और वित्तीय स्थिरता साबित करनी होगी। कंपनियों को यह दिखाना होगा कि उन्होंने पिछले पांच सालों में किसी एक वर्ष में अपने ऑफर किए गए बिड क्वांटिटी का कम से कम 30% सप्लाई किया हो। वित्तीय मोर्चे पर, बोली लगाने वालों का 31 मार्च, 2025 तक नेट वर्थ पॉजिटिव होना चाहिए और पिछले तीन सालों में नेट वर्थ में 30% से ज्यादा की गिरावट नहीं आई हो। इस वित्तीय जांच का मकसद यह सुनिश्चित करना है कि चुने गए पार्टनर राष्ट्रीय करेंसी उत्पादन के पैमाने और सुरक्षा मानकों को पूरा कर सकें।
भारतीय करेंसी प्रोडक्शन का संदर्भ
यह पहल ऐसे समय में आई है जब RBI बड़ी मात्रा में करेंसी सर्कुलेशन का प्रबंधन कर रहा है। हालिया वार्षिक आंकड़ों के अनुसार, पिछले फाइनेंशियल ईयर में केंद्रीय बैंक ने लगभग 2,810 करोड़ करेंसी नोट सप्लाई किए थे, जिनकी छपाई की लागत ₹4,800 करोड़ से ज्यादा थी। साथ ही, खराब या गंदे हो चुके नोटों को बदलना एक लगातार चलने वाला लॉजिस्टिकल काम है, जिसमें उसी अवधि में 1,700 करोड़ नोट नष्ट किए गए। पॉलीमर नोटों को अक्सर सेंट्रल बैंकिंग सर्कल्स में पारंपरिक कॉटन-फाइबर पेपर की तुलना में काफी लंबे समय तक चलने की क्षमता के लिए सराहा जाता है। इससे गंदे नोटों को बार-बार नष्ट करने और फिर से छापने से जुड़ी आवर्ती लागत (recurring costs) और पर्यावरणीय प्रभाव को कम करने में मदद मिल सकती है।
हालांकि यह EoI शुरुआती मात्रा तक सीमित है, यह एक परीक्षण चरण के रूप में काम कर सकती है। सफल फील्ड ट्रायल भविष्य में विभिन्न डिनॉमिनेशन में इसके व्यापक रोलआउट का मार्ग प्रशस्त कर सकते हैं। निवेशक और बाजार विश्लेषक यह देखने के लिए टेंडर प्रक्रिया पर नजर रखेंगे कि कौन से ग्लोबल टेक्नोलॉजी प्रोवाइडर योग्य होते हैं। RBI के लिए अगला कदम इन वैश्विक बोलियों का मूल्यांकन करना और भारत की विशाल कैश-आधारित अर्थव्यवस्था में पॉलीमर करेंसी के उत्पादन को बढ़ाने की परिचालन व्यवहार्यता (operational feasibility) निर्धारित करना होगा।
