RBI की Retail Direct Scheme के आने के बाद से सरकारी सिक्योरिटीज मार्केट में रिटेल निवेशकों की भागीदारी में **40 गुना** का बड़ा उछाल आया है। निवेशक अब ब्याज दरों के जोखिम से बचने के लिए Floating Rate Bonds को प्राथमिकता दे रहे हैं, जबकि लिक्विडिटी के चलते Central Government Securities पहली पसंद बनी हुई हैं।
भारत के सरकारी डेट मार्केट में अब रिटेल निवेशकों की सक्रियता तेजी से बढ़ रही है। RBI की Retail Direct Scheme लॉन्च होने के बाद से इंडिविजुअल इन्वेस्टर्स के ट्रेड वॉल्यूम में 40 गुना की जबरदस्त बढ़ोतरी देखी गई है। यह बदलाव साफ बताता है कि छोटे निवेशक अब केवल पैसिव सेविंग के बजाय अपने डेट पोर्टफोलियो को सक्रिय रूप से मैनेज करने पर ध्यान दे रहे हैं।
पोर्टफोलियो में बदलाव
निवेशकों की पसंद में सबसे बड़ा बदलाव इंस्ट्रूमेंट्स के चयन को लेकर आया है। पहले रिटेल निवेशक अक्सर छोटी अवधि के Treasury Bills को चुनते थे, लेकिन अब उनका ध्यान Floating Rate Bonds की ओर शिफ्ट हो गया है। मार्च 2026 तक, रिटेल पोर्टफोलियो में इन बॉन्ड्स की हिस्सेदारी बढ़कर लगभग 46.7% हो गई है।
क्यों है Floating Rate Bonds का क्रेज?
इस बदलाव के पीछे मुख्य वजह ब्याज दरों (Interest Rates) के उतार-चढ़ाव से खुद को सुरक्षित रखना है। जब अर्थव्यवस्था में ब्याज दरें बढ़ती हैं, तो फिक्स्ड-रेट बॉन्ड्स की कीमतें गिरने लगती हैं। इसके विपरीत, Floating Rate Bonds का कूपन रेट मार्केट बेंचमार्क से जुड़ा होता है और समय-समय पर रीसेट होता रहता है। यह फीचर निवेशकों को बढ़ती ब्याज दरों के जोखिम से बचाता है, जो दिखाता है कि अब भारतीय रिटेल निवेशक पहले से कहीं ज्यादा समझदार हो गए हैं।
State Government Securities पिछड़ीं
सभी सरकारी सिक्योरिटीज को एक जैसी सफलता नहीं मिली है। राज्य सरकारों की सिक्योरिटीज (State Government Securities) व्यक्तिगत निवेशकों को लुभाने में संघर्ष कर रही हैं। शुरुआती 2026 के आंकड़ों के मुताबिक, प्राइमरी मार्केट में इनकी हिस्सेदारी घटकर मात्र 6.1% रह गई है। इसकी सबसे बड़ी बाधा लिक्विडिटी है। Central Government Securities में ट्रेडिंग काफी आसान है, जबकि स्टेट बॉन्ड्स में वॉल्यूम कम होने के कारण निवेशकों को इन्हें बेचने में अक्सर मुश्किलों का सामना करना पड़ता है।
साफ है कि छोटे निवेशकों के लिए ब्याज दर के अलावा निवेश की लिक्विडिटी सबसे बड़ी प्राथमिकता है। यदि भविष्य में स्टेट बॉन्ड्स में बेहतर ट्रांसपेरेंसी और ट्रेडिंग एक्टिविटी नहीं बढ़ती, तो वे केंद्रीय सरकारी बॉन्ड्स के मुकाबले पिछड़े ही रहेंगे।
