RBI की ओर से चल रहे ब्याज दरों के पॉज (Pause) पर जल्द विराम लग सकता है। अगस्त में महंगाई दर बढ़कर **4.82%** पर पहुंचने और कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों के चलते एक्सपर्ट्स **2027** की शुरुआत तक रेपो रेट को **5.75%** तक ले जाने की उम्मीद जता रहे हैं।
महंगाई और एनर्जी का दबाव
ब्याज दरों में संभावित बढ़ोतरी की सबसे बड़ी वजह हालिया महंगाई के आंकड़े हैं। अगस्त 2026 में कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स (CPI) बढ़कर 4.82% पर पहुंच गया है, जो जुलाई में 4.45% था। इसमें सबसे बड़ी भूमिका ब्रेंट क्रूड ऑयल (Brent Crude Oil) की है, जो लगातार $100 प्रति बैरल के ऊपर बना हुआ है। बढ़ती ऊर्जा कीमतों का असर रोजमर्रा की चीजों पर पड़ रहा है, जिसे काबू करने के लिए RBI को कड़ा रुख अपनाना पड़ सकता है।
लिक्विडिटी का गणित
सिर्फ महंगाई ही नहीं, बल्कि बैंकिंग सिस्टम में मौजूद रिकॉर्ड लिक्विडिटी भी एक बड़ी चुनौती है। सितंबर 2026 में सिस्टम में लिक्विडिटी सरप्लस ₹10 लाख करोड़ के आंकड़े को पार कर गया है। इतनी अधिक नकदी के कारण शॉर्ट-टर्म ब्याज दरें कम बनी हुई हैं। एक्सपर्ट्स का मानना है कि रेपो रेट बढ़ाने से पहले RBI, VRRR (Variable Rate Reverse Repo) ऑक्शन के जरिए मार्केट से अतिरिक्त नकदी खींचने पर जोर दे सकता है।
आम आदमी और शेयर बाजार पर असर
रेपो रेट बढ़ने का सीधा असर लोन लेने वालों पर पड़ेगा। होम लोन, ऑटो लोन और पर्सनल लोन की ईएमआई (EMI) में बढ़ोतरी तय है, जिससे कंज्यूमर डिमांड पर दबाव बढ़ सकता है। वहीं, शेयर बाजार के लिहाज से देखें तो कंपनियों की फंड जुटाने की लागत बढ़ जाएगी। खास तौर पर ज्यादा कर्ज वाली कंपनियों के मुनाफे पर असर पड़ सकता है, जबकि फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) और बॉन्ड्स पर रिटर्न आकर्षक होने से इक्विटी मार्केट में रि-असेसमेंट की स्थिति बन सकती है।
