Reserve Bank of India (RBI) द्वारा आयोजित ₹50,000 करोड़ की ओवरनाइट रेपो नीलामी में बैंकों की ओर से ₹93,241 करोड़ की भारी मांग देखने को मिली है। बैंकिंग सिस्टम में नकदी की इस तंगी का सीधा असर भविष्य में आपकी लोन और डिपॉजिट ब्याज दरों पर पड़ सकता है।
बैंकों में क्यों मची है कैश की होड़?
RBI ने बुधवार को ओवरनाइट वेरिएबल रेट रेपो (VRR) नीलामी आयोजित की थी। केंद्रीय बैंक ने बाजार से ₹50,000 करोड़ की मांग रखी थी, लेकिन बैंकों ने ₹93,241 करोड़ की बोलियां लगाईं। RBI ने अंततः ₹50,007 करोड़ को 5.52% की कट-ऑफ दर पर स्वीकार किया। यह ओवरसब्सक्रिप्शन साफ बताता है कि बैंकों को अपनी दैनिक कामकाज चलाने के लिए शॉर्ट-टर्म फंड की सख्त जरूरत है।
लिक्विडिटी कंट्रोल के पीछे की चाल
20 अक्टूबर तक बैंकिंग सिस्टम में सरप्लस लिक्विडिटी घटकर लगभग ₹48,303 करोड़ रह गई है। यह अचानक नहीं हुआ है, बल्कि RBI की सोची-समझी रणनीति है। महंगाई को काबू में रखने और ब्याज दरों में हालिया 25 बेसिस पॉइंट की बढ़ोतरी का असर पूरी अर्थव्यवस्था में पहुंचाने के लिए RBI सिस्टम से अतिरिक्त नकदी को सोख रहा है। जब लिक्विडिटी टाइट होती है, तो बैंकों के लिए लोन सस्ता बनाए रखना मुश्किल हो जाता है।
ये हैं लिक्विडिटी कम होने के मुख्य कारण
सिस्टम में नकदी कम होने के पीछे कई बड़े कदम उठाए गए हैं:
- CRR (Cash Reserve Ratio): RBI ने बैंकों के लिए दैनिक न्यूनतम रखरखाव की अनिवार्यता को 90% से बढ़ाकर 99% कर दिया है।
- Open Market Operations: सरकार ने सरकारी प्रतिभूतियों (Government Securities) की बिक्री के जरिए अतिरिक्त पैसा बाजार से बाहर निकाला है।
- GST आउटफ्लो: टैक्स पेमेंट की वजह से भी बैंकों के पास मौजूद सरप्लस कैश में गिरावट आई है।
निवेशकों के लिए क्या है संकेत?
निवेशकों को अब सतर्क रहना होगा। अगर नकदी की तंगी बरकरार रहती है, तो बैंकों पर अपने मार्जिन को बनाए रखने का दबाव बढ़ेगा। इसके चलते बैंक अब फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) पर बेहतर ब्याज दरें पेश करने के लिए मजबूर हो सकते हैं, जिसका सीधा मतलब है कि कर्ज लेने वालों के लिए भी लोन महंगा हो सकता है। आने वाले समय में इंटरबैंक कॉल मनी रेट्स में उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकता है, जिस पर नजर रखना बेहद जरूरी है।
