RBI Liquidity Policy: लिक्विडिटी मैनेजमेंट के लिए RBI का बड़ा फैसला, NRE और FCNR(B) डिपॉजिट नियमों में बदलाव

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AuthorSaanvi Reddy|Published at:
RBI Liquidity Policy: लिक्विडिटी मैनेजमेंट के लिए RBI का बड़ा फैसला, NRE और FCNR(B) डिपॉजिट नियमों में बदलाव

रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) ने बैंकिंग सिस्टम में लिक्विडिटी मैनेज करने के लिए अपने पुराने और भरोसेमंद टूल्स VRRR और SDF का रुख किया है। साथ ही, रेपो रेट को **5.25%** पर स्थिर रखते हुए, NRE और FCNR(B) डिपॉजिट पर मिलने वाली छूट की समय सीमा को घटाकर **31 अगस्त 2026** कर दिया गया है।

बाजार में लिक्विडिटी का गणित

भारतीय रिजर्व बैंक बाजार से अतिरिक्त नकदी को सोखने के लिए अब किसी बड़े और असाधारण कदम की जगह अपने स्टैंडर्ड टूल्स का इस्तेमाल कर रहा है। इनमें मुख्य रूप से वेरिएबल रेट रिवर्स रेपो (VRRR) ऑक्शंस और स्टैंडिंग डिपॉजिट फैसिलिटी (SDF) शामिल हैं। इन माध्यमों से सेंट्रल बैंक मनी मार्केट में स्थिरता बनाए रखने का प्रयास कर रहा है।

डिपॉजिट नियमों में अहम बदलाव

रेगुलेटर ने CRR (Cash Reserve Ratio) और SLR (Statutory Liquidity Ratio) के तहत मिलने वाली छूट को लेकर बड़ा फैसला लिया है। अब FCNR(B) और NRE डिपॉजिट के लिए छूट की डेडलाइन को 30 सितंबर 2026 से घटाकर 31 अगस्त 2026 कर दिया गया है। यह कदम बाजार में लिक्विडिटी नॉर्म्स को और बेहतर बनाने की दिशा में एक सोची-समझी रणनीति है।

पॉलिसी और निवेशकों पर असर

अगस्त 2026 की मॉनेटरी पॉलिसी कमिटी की मीटिंग में रेपो रेट को 5.25% पर कायम रखा गया है। इसका साफ मतलब है कि सेंट्रल बैंक का फोकस पॉलिसी ट्रांसमिशन को प्रभावी रखने पर है। हालांकि, वेस्ट एशिया में जारी जियोपॉलिटिकल तनाव और महंगाई के दबाव के चलते बैंकों के नेट इंटरेस्ट मार्जिन (NIMs) पर असर पड़ सकता है।

निवेशकों के लिए सलाह है कि वे बैंकों की डिपॉजिट ग्रोथ और क्रेडिट-टू-डिपॉजिट रेशियो पर नजर रखें। आने वाले समय में लिक्विडिटी एडजस्टमेंट पूरी तरह से सिस्टम की जरूरतों के हिसाब से ही तय होंगे, जिससे बाजार में अनचाही अस्थिरता से बचा जा सके।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.