RBI ने **₹23,000 करोड़** के ट्रेजरी बिल (T-Bill) ऑक्शन की सभी बोलियों को खारिज कर दिया है। निवेशकों द्वारा ऊंचे रिटर्न की मांग के बीच सेंट्रल बैंक का यह कदम बॉन्ड मार्केट में बढ़ते तनाव को दर्शाता है।
सेंट्रल बैंक यानी RBI ने 22 अक्टूबर, 2026 को ₹23,000 करोड़ के ट्रेजरी बिल नीलामी में एक भी बोली स्वीकार नहीं की। यह एक दुर्लभ फैसला है, जिसके पीछे मुख्य वजह यह रही कि निवेशक सरकार से उससे ज्यादा रिटर्न की मांग कर रहे थे, जितना RBI देने के लिए तैयार थी। जब निवेशक सरकारी सिक्योरिटीज के लिए ज्यादा ब्याज दरें मांगते हैं, तो सरकार की उधारी लागत (borrowing cost) बढ़ जाती है। इस नीलामी को रद्द करके, रेगुलेटर ने साफ संकेत दिया है कि वह बाजार में चल रही मौजूदा कीमतों से असहज है।
बॉन्ड मार्केट में बढ़ता दबाव
यह गतिरोध बॉन्ड मार्केट के मौजूदा तनाव को दर्शाता है। अक्टूबर के महीने में ही बेंचमार्क 10-वर्षीय सरकारी बॉन्ड की यील्ड 24 बेसिस पॉइंट्स बढ़ चुकी है, जो 2023 की शुरुआत के बाद उच्चतम स्तर पर है। इसके पीछे मुख्य कारण महंगाई को लेकर निवेशकों की चिंताएं हैं, जो अक्सर ग्लोबल ऑयल कीमतों से प्रभावित होती हैं। जब निवेशकों को महंगाई का डर होता है, तो वे डेट इंस्ट्रूमेंट्स पर अधिक रिटर्न मांगते हैं, जिससे बॉन्ड की कीमतें गिर जाती हैं।
लिक्विडिटी का संकट
इस स्थिति का एक बड़ा कारण बैंकिंग सिस्टम में बदलती लिक्विडिटी है। कीमतों में स्थिरता बनाए रखने के लिए, RBI ने बॉन्ड बिक्री और फॉरेक्स स्वैप के जरिए बैंकिंग सिस्टम से अतिरिक्त नकदी को तेजी से निकाला है। सिस्टम में लिक्विडिटी जो अक्टूबर की शुरुआत में लगभग ₹5 लाख करोड़ थी, वह 20 अक्टूबर तक घटकर लगभग ₹570 अरब रह गई है। नकदी की कमी के कारण सरकारी डेट की मांग कम हो गई है, जिससे यील्ड में स्वाभाविक रूप से उछाल आया है।
निवेशकों के लिए क्या है संकेत?
यह नीलामी रद्द होना फिक्स्ड-इनकम मार्केट के सामने मौजूद चुनौतियों का एक स्पष्ट संकेत है। हालांकि सेंट्रल बैंक मार्केट के दबाव के बावजूद उधारी लागत को मैनेज करने की कोशिश कर रहा है, लेकिन ब्याज दरों को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है। डेट म्यूचुअल फंड और फिक्स्ड-इनकम पोर्टफोलियो वाले निवेशकों को आने वाले समय में उतार-चढ़ाव के लिए तैयार रहना चाहिए।
