RBI की अगली मॉनेटरी पॉलिसी को लेकर ग्लोबल ब्रोकरेज हाउस बंटे हुए हैं। जहाँ BofA और Morgan Stanley बड़ी बढ़ोतरी के संकेत दे रहे हैं, वहीं Nomura का मानना है कि महंगाई में नरमी के कारण RBI सतर्क रुख अपनाएगा।
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की आने वाली पॉलिसी को लेकर ग्लोबल वित्तीय संस्थाओं के बीच भारी मतभेद देखने को मिल रहा है। यह बहस इस बात पर है कि क्या सेंट्रल बैंक को महंगाई को काबू करने के लिए आक्रामक रुख अपनाना चाहिए या घरेलू ग्रोथ की सुस्ती को देखते हुए नरम रुख रखना चाहिए।
आक्रामक बढ़ोतरी के पक्ष में तर्क
Bank of America Global Research और Morgan Stanley का मानना है कि RBI को कड़ा फैसला लेना होगा। Bank of America ने अगले 12 महीने में 100 से 125 बेसिस पॉइंट्स की बढ़ोतरी का अनुमान जताया है, जिससे रेपो रेट 6.25% तक पहुंच सकता है। वहीं, Morgan Stanley ने अक्टूबर की पॉलिसी में 25 बेसिस पॉइंट्स की बढ़ोतरी की उम्मीद जताई है। उनका तर्क है कि ग्लोबल अस्थिरता और महंगाई को रोकने के लिए ब्याज दरों में इजाफा जरूरी है।
लिक्विडिटी का मुद्दा
HSBC ने एक अलग चुनौती सामने रखी है—बैंकिंग सिस्टम में मौजूद अतिरिक्त नकदी (Excess Liquidity), जो लगभग ₹15 लाख करोड़ आंकी गई है। HSBC का कहना है कि सिर्फ रेट बढ़ाने से काम नहीं चलेगा, RBI को सिस्टम से इस अतिरिक्त नकदी को बाहर निकालने पर भी ध्यान देना होगा।
Nomura का सतर्क नज़रिया
इसके उलट, Nomura का नजरिया ज्यादा संतुलित है। उनके अनुसार, कोर इन्फ्लेशन 3% के आसपास सीमित है और वेतन वृद्धि से कीमतों में बढ़ोतरी का डर फिलहाल बेबुनियाद है। इसी आधार पर Nomura ने कुल 50 बेसिस पॉइंट्स की बढ़ोतरी का अनुमान जताया है, जो अक्टूबर और दिसंबर के बीच दो किस्तों में हो सकती है।
निवेशकों के लिए यह पॉलिसी बेहद अहम है, क्योंकि रेपो रेट में बदलाव का सीधा असर कंपनियों के कर्ज पर और बैंकों के नेट इंटरेस्ट मार्जिन पर पड़ता है। आने वाली घोषणा यह स्पष्ट करेगी कि RBI का फोकस महंगाई पर है या इकोनॉमिक ग्रोथ को बचाने पर।
