बढ़ती महंगाई और RBI के ऊंचे ब्याज दरों के चलते आम भारतीय परिवारों का बजट बिगड़ रहा है। EMI का बोझ बढ़ने और लोन की अवधि बढ़ाने की सीमा खत्म होने से कंज्यूमर डिमांड पर दबाव दिख रहा है।
ब्याज दरों का बढ़ता दबाव\n\nअक्टूबर 2026 तक आते-आते Reserve Bank of India की ब्याज दरें आम कर्जदारों के लिए बड़ी चुनौती बन गई हैं। भले ही दरों में बढ़ोतरी की रफ्तार पहले से कम हुई हो, लेकिन लंबे समय तक दरें ऊंची रहने से शहरों और गांवों, दोनों में आम परिवारों की डिस्पोजेबल इनकम (खर्च योग्य आय) तेजी से घट रही है।\n\n### EMI या लोन टेन्योर: कर्जदारों के सामने संकट\n\nजब Repo Rate बढ़ता है, तो बैंक और NBFCs तुरंत इसका असर रिटेल ग्राहकों पर डालते हैं, जिससे होम लोन, पर्सनल लोन और ऑटो लोन की दरें महंगी हो जाती हैं। कर्जदारों के पास अब दो ही रास्ते बचे हैं: या तो वे ज्यादा EMI दें या लोन की अवधि (tenure) बढ़ा लें। अब तक ज्यादातर लोगों ने टेन्योर बढ़ाकर राहत पाई थी, लेकिन अब यह तरीका भी काम नहीं कर रहा क्योंकि अधिकांश लोन अपनी अधिकतम अवधि (maximum tenure) तक पहुंच चुके हैं। नतीजा यह है कि लोगों को मजबूरन अपनी मंथली आउटफ्लो बढ़ानी पड़ रही है, जिसका सीधा असर उनके जरूरी खर्चों पर पड़ रहा है।\n\n### महंगाई का दोहरा प्रहार\n\nइस कर्ज के बोझ को महंगाई ने और जटिल बना दिया है। खाने-पीने की चीजों और फ्यूल की ऊंची कीमतों के कारण घरेलू बजट पहले से ही डगमगा रहा है। वेतन में उस रफ्तार से बढ़ोतरी न होने के कारण परिवारों की खरीदारी की क्षमता (purchasing power) कम हो गई है।\n\n### बैंकिंग सेक्टर और निवेशकों के लिए संकेत\n\nनिवेशकों की नजर अब बैंकों की आने वाली तिमाही नतीजों (Quarterly Earnings) पर है। बाजार यह देख रहा है कि कहीं बढ़ते ब्याज दरों के कारण बैंकों के 'बैड लोंस' न बढ़ जाएं या रिटेल क्रेडिट ग्रोथ में सुस्ती न आ जाए। यदि उपभोक्ता अपनी जीवनशैली, मनोरंजन और ट्रैवल जैसे खर्चों में कटौती करते हैं, तो यह अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ा संकेत हो सकता है कि कंज्यूमर डिमांड अब दबाव में है।