कैसे RBI ने चुना 'पॉज़' का रास्ता?
भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) की मॉनेटरी पॉलिसी कमेटी (MPC) से इस शुक्रवार को पॉलिसी रेपो रेट को 5.25% पर ही बनाए रखने की उम्मीद है। इस फैसले के पीछे भारत की मजबूत मैक्रो इकोनॉमिक स्थिति है, जिसमें फाइनेंशियल ईयर 2025-26 के लिए GDP ग्रोथ 7.4% रहने का अनुमान है। वहीं, दिसंबर 2025 में महंगाई दर 1.33% पर रही, जो RBI के 2%-6% के लक्ष्य के भीतर है।
इसके अलावा, हाल ही में US-India के बीच हुए ट्रेड डील ने भारतीय एक्सपोर्ट्स पर लगने वाले US टैरिफ को ~50% से घटाकर 18% कर दिया है। इससे एक्सपोर्ट्स को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है और यह बाहरी आर्थिक संबंधों में एक सकारात्मक संकेत है। इन सब वजहों से RBI पर अतिरिक्त रेट कट का दबाव कम हुआ है। पिछले फाइनेंशियल ईयर फरवरी 2025 से अब तक RBI ने कुल 125 बेसिस पॉइंट्स की कटौती की है, जिससे रेपो रेट 5.25% पर आ गया है। अब RBI का मुख्य ध्यान इस बात पर है कि पिछली ब्याज दरों में हुई कटौती का असली अर्थव्यवस्था पर क्या असर पड़ रहा है।
बॉन्ड मार्केट में क्यों है 'टेंशन'?
चिंता की बात यह है कि पॉलिसी रेट में नरमी के बावजूद, बेंचमार्क 10-साल के भारतीय सरकारी बॉन्ड यील्ड (yield) 6.70% के आसपास बने हुए हैं। यह दर्शाता है कि पॉलिसी रेट और लोन की लागत के बीच एक बड़ा गैप है। इससे मॉनेटरी पॉलिसी का फायदा आम लोगों और बिज़नेस तक पहुंचने में मुश्किल हो रही है।
भारतीय बॉन्ड मार्केट पर सरकारी उधारी के भारी दबाव का असर दिख रहा है। फाइनेंशियल ईयर 2026-27 के लिए ₹17.2 लाख करोड़ के ग्रॉस मार्केट बॉरोइंग प्रोग्राम का अनुमान है, जो मार्केट की सोखने की क्षमता को चुनौती दे रहा है। इस दबाव को कम करने के लिए, RBI ने खुले बाजार परिचालन (OMOs) के जरिए जनवरी और फरवरी 2026 में ₹1 लाख करोड़ के बॉन्ड खरीदे हैं। दिसंबर 2025 में भी ऐसे ही OMOs और 5 अरब डॉलर के बाय-सेल स्वैप किए गए थे। ये कदम लिक्विडिटी को बढ़ाने और यील्ड को स्थिर रखने के लिए जरूरी हैं, लेकिन ये मार्केट में मौजूद तनाव को भी दिखाते हैं।
रुपये की अस्थिरता को काबू में रखने के लिए किए गए फॉरेन एक्सचेंज इंटरवेंशन (forex interventions) ने भी लिक्विडिटी को कम किया है। हालांकि, जनवरी 2026 तक भारत का फॉरेन एक्सचेंज रिजर्व 709 अरब डॉलर के रिकॉर्ड स्तर पर पहुँच गया है, जो अर्थव्यवस्था की मजबूती को दर्शाता है। लेकिन RBI के मार्केट ऑपरेशन्स यील्ड में अचानक बढ़ोतरी को रोकने के लिए महत्वपूर्ण हैं, जो ग्रोथ की रफ्तार को धीमा कर सकती हैं।
आगे क्या हो सकता है?
विश्लेषकों का मानना है कि 2026 तक RBI अपनी पॉलिसी रेट्स को स्थिर रख सकता है और 'न्यूट्रल' (neutral) स्टैंड पर बने रहने की संभावना है। हाल ही में पेश हुए यूनियन बजट 2026-27 में भी फिस्कल कंसोलिडेशन (fiscal consolidation) पर जोर दिया गया है, जिसमें FY27 के लिए फिस्कल डेफिसिट को GDP का 4.3% रखने का लक्ष्य है।
कम महंगाई और इस फिस्कल पॉलिसी की निरंतरता RBI को पिछले फैसलों के असर पर गौर करने का मौका देगी। फिर भी, बॉन्ड यील्ड पर ऊपर की ओर दबाव बने रहने की उम्मीद है। अनुमान है कि चौथी तिमाही 2026 तक 10-साल के बॉन्ड यील्ड 7% के स्तर तक पहुंच सकते हैं। ऐसे में, RBI की लिक्विडिटी को मैनेज करने और मॉनेटरी पॉलिसी के ट्रांसमिशन को सुचारू बनाने की क्षमता, वित्तीय बाज़ार की इन उठापटक के बीच अर्थव्यवस्था के ग्रोथ पाथ को सपोर्ट करने के लिए अहम होगी।