RBI Policy: 'No Rate Cut' की तैयारी? महंगाई बढ़ी, ग्रोथ घटी! Dalal Street पर क्या होगा असर?

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AuthorAditya Rao|Published at:
RBI Policy: 'No Rate Cut' की तैयारी? महंगाई बढ़ी, ग्रोथ घटी! Dalal Street पर क्या होगा असर?
Overview

भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की मॉनेटरी पॉलिसी कमेटी (MPC) 6 फरवरी को होने वाली अपनी अगली बैठक में **रेपो रेट को 5.25% पर स्थिर रख सकती है।** बढ़ती महंगाई और धीमी पड़ती इकोनॉमिक ग्रोथ के बीच, RBI का ध्यान अब लिक्विडिटी मैनेजमेंट पर ज़्यादा केंद्रित दिख रहा है, ताकि पॉलिसी स्पेस को बनाए रखा जा सके।

### महंगाई का बढ़ता बोझ और ग्रोथ की धीमी रफ्तार

RBI की मॉनेटरी पॉलिसी कमेटी (MPC) के सामने इस समय सबसे बड़ी चुनौती महंगाई और इकोनॉमिक ग्रोथ के बीच संतुलन बनाना है। विश्लेषकों का मानना है कि MPC रेपो रेट को 5.25% पर अपरिवर्तित रख सकती है। नवंबर 2025 में कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स (CPI) 0.71% तक पहुंच गया, जो अक्टूबर 2025 के 0.25% से काफी ऊपर है। खाने-पीने की चीज़ों की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी इस बढ़ोतरी का मुख्य कारण है। वहीं, फाइनेंशियल ईयर 2027 के लिए इकोनॉमिक ग्रोथ का अनुमान भी घटाकर 6.7% से 7% के बीच रहने की उम्मीद है। इन विपरीत परिस्थितियों को देखते हुए, RBI के पास दरों में कटौती की गुंजाइश बहुत कम है। जानकारों के अनुसार, 5.25% के रेपो रेट पर लगभग 125 बेसिस पॉइंट्स का रियल इंटरेस्ट रेट (महंगाई को घटाने के बाद की प्रभावी ब्याज दर) एक संतुलित और सुरक्षित स्तर माना जा रहा है।

### ग्लोबल संकेत और डोमेस्टिक इकोनॉमी पर असर

दुनिया भर के कई उभरते बाज़ारों (Emerging Markets) के सेंट्रल बैंक भी भारत की तरह ही महंगाई को कंट्रोल करने और इकोनॉमिक ग्रोथ को सहारा देने के बीच एक मुश्किल राह पर चल रहे हैं। जहाँ एक ओर ग्लोबल महंगाई में कुछ नरमी आई है, वहीं कुछ ज़रूरी वस्तुओं के दाम अभी भी चिंता का विषय बने हुए हैं, जिसका असर इम्पोर्ट (Import) के ज़रिए भारत पर भी पड़ता है। RBI का यह 'पॉलिसी पॉज' (Policy Pause) इकोनॉमी को स्थिरता दे सकता है, खासकर जब ग्रोथ का आउटलुक (Outlook) मज़बूत हो। हालांकि, अगर महंगाई लगातार बढ़ती रहती है और ग्रोथ धीमी बनी रहती है, तो निवेशकों का सेंटीमेंट (Sentiment) थोड़ा नरम पड़ सकता है। स्थिर ब्याज दरें कंपनियों और आम ग्राहकों के लिए लोन की लागत को एक समान बनाए रखेंगी, और विश्लेषकों के अनुसार, बॉन्ड यील्ड (Bond Yields) के ज़्यादातर एक सीमित दायरे में ही रहने की संभावना है।

### लिक्विडिटी मैनेजमेंट का बढ़ता महत्व

ब्याज दरें स्थिर रखने के फैसले के साथ-साथ, RBI सिस्टम में नकदी (Liquidity) को किस तरह मैनेज करती है, यह देखना काफी अहम होगा। हाल ही में RBI ने बॉन्ड खरीदने के लिए ओपन मार्केट ऑपरेशंस (OMOs) और फॉरेक्स स्वैप (Forex Swaps) जैसे अहम कदम उठाए हैं। ये उपाय मनी सप्लाई (Money Supply) को कंट्रोल करने और इंटरबैंक लेंडिंग रेट (Interbank Lending Rate) को पॉलिसी रेपो रेट के करीब बनाए रखने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। लिक्विडिटी मैनेजमेंट पर यह बढ़ता ज़ोर RBI को मॉनेटरी पॉलिसी के असर को पूरे फाइनेंशियल सिस्टम में बेहतर ढंग से प्रसारित (transmit) करने में मदद करेगा।

### भविष्य की राह और RBI का नज़रिया

RBI का यह संतुलित रुख (Stance) स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि वे भविष्य में आने वाले इकोनॉमिक डेवलपमेंट के हिसाब से अपनी पॉलिसी में पूरी फ्लेक्सिबिलिटी (Flexibility) बनाए रखेंगे। मॉनेटरी पॉलिसी कमेटी (MPC) की आने वाली कमेंट्री (Commentary) में महंगाई को काबू में रखने और इकोनॉमिक ग्रोथ को सहारा देने के बीच के जटिल ट्रेड-ऑफ (Trade-off) को साफ तौर पर देखा जा सकेगा। RBI फिलहाल महंगाई पर नियंत्रण को अपनी मुख्य प्राथमिकता बनाए रखेगी, लेकिन अगर इकोनॉमी में कोई बड़ी गिरावट आती है या महंगाई उम्मीद से ज़्यादा बढ़ती है, तो वे ज़रूरत पड़ने पर तुरंत एक्शन लेने से नहीं हिचकिचाएंगे। वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए, किसी बड़ी ब्याज दर कटौती (Rate Cut) की उम्मीद तो नहीं है, लेकिन RBI के पास भविष्य में किसी भी आर्थिक चुनौती से निपटने के लिए सभी विकल्प खुले हैं।

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