Reserve Bank of India (RBI) ने 11 सितंबर, 2026 को हुई सरकारी बॉन्ड नीलामी में कुछ बोलियों को अस्वीकार कर दिया है। यह कदम बॉन्ड यील्ड (bond yields) में हो रही अनावश्यक बढ़ोतरी को रोकने के मकसद से उठाया गया है, ताकि रिकॉर्ड लिक्विडिटी और ग्लोबल मार्केट के दबाव के बीच स्थिरता बनी रहे।
बाजार को स्पष्ट संकेत
RBI ने शुक्रवार को 6.20% 2029 सरकारी बॉन्ड की नीलामी को आंशिक रूप से रद्द करके मार्केट को कड़ा संदेश दिया है। केंद्रीय बैंक ने पूरी राशि स्वीकार करने के बजाय केवल ₹45.06 बिलियन की बोलियां स्वीकार कीं, जो कि नियोजित इश्यू का लगभग 40% ही था। यह हस्तक्षेप बताता है कि आरबीआई बॉन्ड यील्ड में हालिया उछाल से खुश नहीं है और इसे और बढ़ने से रोकना चाहता है।
लिक्विडिटी का गणित
यह नीलामी ऐसे समय में हुई है जब बैंकिंग सिस्टम में लिक्विडिटी ₹10 ट्रिलियन के रिकॉर्ड स्तर को पार कर गई है। इसका मुख्य कारण देश में विदेशी मुद्रा का भारी इनफ्लो है। इस अतिरिक्त नकदी को मैनेज करने के लिए, आरबीआई ने उसी दिन 26-दिन की वेरिएबल रेट रिवर्स रेपो (VRRR) नीलामी भी आयोजित की। इसका उद्देश्य शॉर्ट-टर्म ब्याज दरों को स्थिर रखना और वित्तीय प्रणाली में अस्थिरता को रोकना है।
यील्ड पर ग्लोबल दबाव
घरेलू बॉन्ड यील्ड पर क्रूड ऑयल की बढ़ती कीमतों और अमेरिका में ब्याज दरों की उम्मीदों का दबाव दिख रहा है। जैसे-जैसे अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड ऊपर जा रही है, भारतीय बॉन्ड मार्केट में निवेशक अधिक रिटर्न की मांग कर रहे हैं। 6.20% 2029 बॉन्ड की यील्ड पिछले एक महीने में 25 बेसिस पॉइंट्स बढ़कर लगभग 6.45% तक पहुंच गई थी, जिसने आरबीआई को एक्शन के लिए मजबूर किया।
निवेशकों के लिए जोखिम
निवेशकों को ध्यान रखना चाहिए कि आरबीआई इस समय एक नाजुक संतुलन बनाने की कोशिश कर रहा है। यदि ग्लोबल अनिश्चितता बनी रहती है, तो यील्ड के और ऊपर जाने का जोखिम बना रहेगा। यदि भारतीय और अमेरिकी बॉन्ड यील्ड के बीच का अंतर काफी कम हो जाता है, तो विदेशी निवेशकों की तरफ से डेट आउटफ्लो का दबाव बढ़ सकता है, जो स्थानीय बाजार के लिए बड़ी चुनौती साबित हो सकता है।
