RBI की एक विशेषज्ञ समिति ने राज्यों के लिए अस्थायी लिक्विडिटी लिमिट (WMA) को **11.2%** बढ़ाने की सिफारिश की है। इस कदम का मकसद फाइनेंशियल ईयर के अंत में बॉन्ड बाजार पर पड़ने वाले दबाव को कम करना है।
बाजार में उतार-चढ़ाव पर लगाम
फिलहाल, कई राज्य अपनी बाजार उधारी का एक बड़ा हिस्सा फाइनेंशियल ईयर की आखिरी तिमाही यानी जनवरी-मार्च के दौरान करते हैं। एक साथ कई राज्यों द्वारा बॉन्ड जारी करने से मार्केट में अचानक भारी सप्लाई आ जाती है, जिससे बॉन्ड यील्ड (Yield) बढ़ जाती है और इसका सीधा असर ब्याज दरों पर पड़ता है। अब RBI इस प्रक्रिया को व्यवस्थित करना चाहता है ताकि उधारी साल भर एक समान बनी रहे।
ओवरड्राफ्ट नियमों में सख्ती
सिर्फ लिमिट ही नहीं बढ़ाई गई, बल्कि राज्यों के वित्तीय अनुशासन पर भी फोकस किया गया है। समिति ने ओवरड्राफ्ट की सुविधा को लेकर सख्त नियम सुझाए हैं:
- राज्यों के लिए लगातार ओवरड्राफ्ट में रहने की समय सीमा 14 दिन से घटाकर 10 वर्किंग डेज करने का प्रस्ताव है।
- एक तिमाही के भीतर ओवरड्राफ्ट लेने की कुल सीमा को 36 दिन से घटाकर 30 दिन करने की सिफारिश की गई है।
लंबी अवधि की बचत के लिए प्रोत्साहन
दीर्घकालिक वित्तीय मजबूती के लिए, समिति ने 'कंसोलिडेटेड सिंकिंग फंड्स' (Consolidated Sinking Funds) के साथ जुड़ी स्पेशल ड्रॉइंग फैसिलिटी की लिमिट बढ़ाने को कहा है। इसका उद्देश्य राज्यों को भविष्य के कर्ज चुकाने के लिए एक कोष बनाने के लिए प्रेरित करना है। RBI चाहता है कि राज्य अपने कुल बकाया कर्ज का कम से कम 5% हिस्सा अलग से सुरक्षित रखें।
