रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) ने आगामी 12 नवंबर को देश के बड़े बैंकों के CEO के साथ एक महत्वपूर्ण बैठक बुलाई है। इस बैठक का मुख्य एजेंडा नए 'एक्सपेक्टेड क्रेडिट लॉस' (ECL) फ्रेमवर्क को लागू करना है। इस बदलाव से बैंकों के मुनाफे और कैपिटल पर असर पड़ सकता है, जिसे संभालने के लिए RBI ने **4 साल** का समय दिया है।
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने बैंकिंग सेक्टर के लिए एक बड़े अकाउंटिंग बदलाव की तैयारी शुरू कर दी है। वर्तमान में भारतीय बैंक 'इनकर्ड-लॉस' (Incurred-Loss) मॉडल का उपयोग करते हैं, जिसके तहत कर्ज डूबने या डिफॉल्ट होने के बाद ही पैसा अलग रखा जाता है। अब इसे बदलकर 'फॉरवर्ड-लुकिंग' (Forward-looking) ECL सिस्टम किया जाएगा, जिसमें संभावित खतरों को पहले ही भांपकर प्रोविजनिंग करनी होगी। यह नियम 1 अप्रैल, 2027 से पूरी तरह प्रभावी होगा।
मुनाफे पर क्या होगा असर?
निवेशकों के लिए सबसे बड़ी चिंता यह है कि नए नियमों के कारण बैंकों की प्रोविजनिंग लागत बढ़ सकती है, जिसका सीधा असर उनके नेट प्रॉफिट और कॉमन इक्विटी टियर 1 (CET1) कैपिटल पर पड़ सकता है। हालांकि, झटकों से बचाने के लिए RBI ने बैंकों को 4 साल का फेज्ड इंप्लीमेंटेशन टाइम दिया है, जो 31 मार्च, 2031 तक चलेगा।
उदाहरण के तौर पर, State Bank of India (SBI) ने हाल ही में बताया है कि इस बदलाव का अनुमानित असर उनके नेट वर्थ के करीब 3% यानी ₹19,500 करोड़ के आसपास हो सकता है। यह एक बड़ा आंकड़ा है, लेकिन लंबी अवधि की तैयारी के लिए यह बफर मददगार साबित होगा। आगामी बैठक में डेटा मॉडलिंग, सिस्टम रेडीनेस और डिफॉल्ट की संभावनाओं की गणना जैसे तकनीकी पहलुओं पर चर्चा होगी।
निवेशकों के लिए संकेत
आने वाली तिमाहियों में बैंकों के मैनेजमेंट की कमेंट्री पर नजर रखना बेहद जरूरी है। यह देखना अहम होगा कि बैंक इस बदलाव के लिए प्रोविजनिंग को अभी से कितना 'फ्रंटलोड' कर रहे हैं। यदि बैंक बिना बड़े मुनाफे के नुकसान के अपने सिस्टम को अपग्रेड कर लेते हैं, तो यह बैंकिंग सेक्टर की स्थिरता के लिए एक बड़ा सकारात्मक कदम होगा।
