Reserve Bank of India ने OTC डेरिवेटिव कॉन्ट्रैक्ट्स के ट्रांसफर को लेकर सख्त नियम जारी किए हैं। अब किसी भी कॉन्ट्रैक्ट को ट्रांसफर करते समय उसका मार्क-टू-मार्केट (MTM) वैल्यू तुरंत सेटल करना अनिवार्य होगा, जिससे पारदर्शिता बढ़ेगी और जोखिम कम होगा।
अब कैसे होगा डेरिवेटिव कॉन्ट्रैक्ट्स का ट्रांसफर?
Reserve Bank of India (RBI) ने 'नोवेशन' (Novation)—यानी एक पार्टी से दूसरी पार्टी में कॉन्ट्रैक्ट ट्रांसफर करने की प्रक्रिया—के लिए नए और कड़े नियम लागू किए हैं। नई गाइडलाइन्स के तहत, अब ट्रांसफर के समय ही कॉन्ट्रैक्ट की मौजूदा MTM वैल्यू का आदान-प्रदान करना होगा। इसका सीधा मतलब है कि ट्रांसफर पूरा होने से पहले कॉन्ट्रैक्ट का हिसाब-किताब चुकाना अनिवार्य होगा।
क्यों लिया गया यह फैसला?
इस कदम के पीछे मुख्य उद्देश्य 'काउंटरपार्टी रिस्क' को कम करना है। अक्सर बड़े सौदों में डिफ़ॉल्ट होने का डर बना रहता है। अब ट्रांसफर के वक्त ही वैल्यू सेटल करने से जोखिम छिप नहीं पाएगा। यह नियम मौजूदा और भविष्य के सभी कॉन्ट्रैक्ट्स पर लागू होगा।
मार्केट मेकर्स के लिए खास निर्देश
RBI ने साफ कर दिया है कि ये ट्रांजैक्शन केवल उन्हीं के बीच हो सकते हैं जहाँ कम से कम एक पार्टी 'ऑथराइज्ड मार्केट मेकर' या 'सेंट्रल काउंटरपार्टी' हो। इसका मतलब है कि दो आम कंपनियां या ट्रेजरी विभाग आपस में चुपचाप ऑफ-मार्केट ट्रांसफर नहीं कर पाएंगे। इससे पूरा सिस्टम रेगुलेटेड दायरे में रहेगा।
कॉर्पोरेट इवेंट्स पर छूट
हालांकि, कॉर्पोरेट जगत के लिए थोड़ी राहत है। मर्जर या डिमर्जर जैसे कॉर्पोरेट इवेंट्स के कारण होने वाले ट्रांसफर पर दिसंबर 2013 का पुराना ढांचा ही लागू रहेगा, ताकि कंपनियों को किसी तरह की कानूनी उलझन का सामना न करना पड़े।
बैंकों और कंपनियों के लिए क्या है चुनौती?
बैंकों और बड़ी कंपनियों, जो हेजिंग (Hedging) के लिए इन इंस्ट्रूमेंट्स का इस्तेमाल करते हैं, उन्हें अब अपनी इंटरनल कंप्लायंस और डॉक्यूमेंटेशन प्रोसेस को इन नए मानकों के हिसाब से अपडेट करना होगा। इस बदलाव से डेरिवेटिव मार्केट में सिस्टमिक रिस्क काफी हद तक कम होने की उम्मीद है।
