रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) ने अकाउंट एग्रीगेटर (AA) के लिए इंटरऑपरेबिलिटी अनिवार्य कर दी है। साथ ही, 31 दिसंबर 2026 तक बैंक डिपॉजिट को भी कंसोलिडेटेड अकाउंट स्टेटमेंट (CAS) का हिस्सा बना दिया जाएगा।
रेगुलेटरी बदलाव और इसका मतलब
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने एक बड़ा निर्देश जारी किया है जिसके तहत अब अकाउंट एग्रीगेटर (AA) सर्विसेज को इंटरऑपरेबल बनाना अनिवार्य होगा। इसका सीधा फायदा यह होगा कि यूजर्स अलग-अलग प्लेटफॉर्म्स पर अपना डेटा बिना किसी बाधा के शेयर और एक्सेस कर सकेंगे। यह कदम डेटा को 'साइलो' (Silos) से बाहर निकालकर फाइनेंशियल जानकारी को एक फ्री फ्लो देने का प्रयास है। 31 दिसंबर 2026 तक, SEBI-रेगुलेटेड डिपॉजिटरीज के जरिए मैनेज होने वाले कंसोलिडेटेड अकाउंट स्टेटमेंट (CAS) में अब बैंक डिपॉजिट की जानकारी भी शामिल की जाएगी।
मार्केट पर असर और इंफ्रास्ट्रक्चर स्टॉक्स
यह फैसला पर्सनल फाइनेंस के डिजिटलीकरण की दिशा में एक बड़ा कदम है। इससे निवेशकों को अब डिमैट, सिक्योरिटीज और बैंक डिपॉजिट का डेटा एक ही इंटरफेस पर मिल पाएगा। इस खबर के बाद CAMS और Pine Labs जैसे फाइनेंशियल इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़ी कंपनियों के स्टॉक्स में जोश दिखा और इनमें 4.5% तक की तेजी दर्ज की गई। ये कंपनियां डेटा प्रोसेसिंग और प्लेटफॉर्म मेंटेनेंस में बड़ी भूमिका निभाती हैं।
रेपो रेट का दबाव
हालाँकि, इसी दिन RBI ने रेपो रेट में 25 बेसिस पॉइंट्स की बढ़ोतरी कर इसे 5.50% कर दिया है। जहाँ एक तरफ इंटरऑपरेबिलिटी का फैसला फिनटेक अडॉप्शन के लिए सकारात्मक है, वहीं ब्याज दरों में बढ़ोतरी से उधारी महंगी हो गई है, जिससे कॉर्पोरेट मार्जिन पर दबाव बढ़ सकता है।
चुनौतियां और रिस्क
2026 की डेडलाइन तक सभी फाइनेंशियल इंस्टीट्यूशंस को अपने कोर बैंकिंग सिस्टम को अपग्रेड करना होगा। डेटा सिक्योरिटी एक बड़ा चिंता का विषय बनी हुई है। निवेशकों को इस पूरे टेक्निकल माइग्रेशन और 'टेक्निकल कंसल्टेटिव कमिटी' की प्रोग्रेस पर पैनी नजर रखनी होगी, क्योंकि किसी भी प्रकार की तकनीकी चूक से डेटा सुरक्षा को खतरा हो सकता है।
