बैंकिंग सिस्टम में आई भारी भरकम नकदी को कंट्रोल करने के लिए RBI ने कमर कस ली है। लिक्विडिटी के **₹10.31 लाख करोड़** के स्तर को पार करने के बाद, रिजर्व बैंक अब शॉर्ट-टर्म वेरिएबल रेट रिवर्स रेपो (VRRR) ऑक्शन का सहारा ले रहा है ताकि ब्याज दरों में अस्थिरता न आए।
RBI की लिक्विडिटी मैनेजमेंट रणनीति
3 सितंबर, 2026 तक बैंकिंग सिस्टम में मौजूद सरप्लस लिक्विडिटी का आंकड़ा ₹10.31 लाख करोड़ के पार निकल गया है। इस अतिरिक्त नकदी के कारण शॉर्ट-टर्म ब्याज दरों के गिरने का खतरा बना हुआ था, जिसे रोकने के लिए RBI ने अब आक्रामक रुख अपनाया है। केंद्रीय बैंक ने एक बार में बड़ी रकम निकालने के बजाय, छोटे-छोटे शॉर्ट-टर्म ऑक्शन का रास्ता चुना है।
क्यों बढ़ रही है सिस्टम में नकदी?
इस लिक्विडिटी के पीछे मुख्य वजह फॉरेन करेंसी नॉन-रेसिडेंट (FCNR) डिपॉजिट्स के जरिए विदेशी मुद्रा का आना है। जैसे-जैसे ये फंड बैंकिंग सिस्टम में प्रवेश कर रहे हैं, रुपया लिक्विडिटी की सप्लाई बढ़ गई है, जिससे मॉनेटरी पॉलिसी के लक्ष्यों को बनाए रखना चुनौतीपूर्ण हो गया है।
ऑक्शन का हालिया अपडेट
4 सितंबर को RBI ने दो 3-दिवसीय VRRR ऑक्शन किए। इसमें बैंक ने ₹6,02,394 करोड़ की लिक्विडिटी को सफलतापूर्वक सोख लिया। इन ऑक्शन की वेटेड एवरेज कट-ऑफ रेट 5.24% रही। बैंकों का रुझान भी फिलहाल लंबे समय के लिए पैसा लॉक करने के बजाय छोटे समय (शॉर्ट-टेनोर) के लिए फंड पार्क करने का है, जिसे RBI पूरी तरह से सपोर्ट कर रहा है।
मार्केट एक्सपर्ट्स का मानना है कि अगर इस सरप्लस को समय पर मैनेज नहीं किया गया, तो मनी मार्केट में उतार-चढ़ाव बढ़ सकता है। फिलहाल, RBI का फोकस एक बार में सफाई करने के बजाय, निरंतर और टैक्टिकल इंटरवेंशन पर है। निवेशकों को आने वाले समय में VRRR ऑक्शन के नतीजों पर नजर रखनी चाहिए, क्योंकि यही तय करेगा कि ब्याज दरें किस दिशा में जाएंगी।
