भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की मौद्रिक नीति समिति (MPC) की 3 दिवसीय बैठक **5 अक्टूबर 2026** से शुरू हो रही है। इस बार फोकस केवल ब्याज दरों पर नहीं, बल्कि बैंकिंग सिस्टम में मौजूद अत्यधिक नकदी (Excess Liquidity) को काबू करने पर है।
चुनौती क्या है?
RBI की इस बैठक का सबसे बड़ा एजेंडा बैंकिंग सिस्टम में फैली अतिरिक्त नकदी को मैनेज करना है। पिछले कुछ समय में रुपए को संभालने के लिए अपनाए गए विदेशी मुद्रा स्वैप (Forex Swap) कदमों की वजह से सिस्टम में भारी मात्रा में रुपया पंप हो गया है। इन उपायों से भले ही $143 बिलियन का इनफ्लो आया हो, लेकिन इसने बाजार में लिक्विडिटी का सैलाब ला दिया है, जो महंगाई के लिए खतरा बन सकता है।
महंगाई का दबाव
अगस्त 2026 में खुदरा महंगाई 4.82% के स्तर पर दर्ज की गई थी। कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें भी सिरदर्द बनी हुई हैं। वर्तमान में रेपो रेट 5.25% पर है, और जानकारों का मानना है कि केवल ब्याज दरें बढ़ाना काफी नहीं होगा।
क्या RBI लेगा बड़ा फैसला?
मार्केट में चर्चा है कि RBI रेपो रेट में 25 bps की बढ़ोतरी कर सकता है, लेकिन असली गेम लिक्विडिटी सोखने के तरीकों पर होगा। एनालिस्ट्स का मानना है कि केंद्रीय बैंक नकदी को सिस्टम से निकालने के लिए कैश रिजर्व रेश्यो (CRR) बढ़ाने जैसा सख्त कदम भी उठा सकता है।
निवेशकों के लिए अब सबसे महत्वपूर्ण यह होगा कि RBI अपने कम्युनिकेशन में लिक्विडिटी को लेकर क्या गाइडेंस देता है। आने वाले महीनों में कर्ज की लागत और क्रेडिट एनवायरनमेंट इसी बात पर निर्भर करेगा कि केंद्रीय बैंक इन स्ट्रक्चरल इंबैलेंस को कैसे ठीक करता है।
