RBI Liquidity: बाजार से नकदी खींच रहा रिजर्व बैंक, शॉर्ट-टर्म बॉन्ड यील्ड में उछाल से निवेशकों की बढ़ी चिंता

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AuthorNeha Patil|Published at:
RBI Liquidity: बाजार से नकदी खींच रहा रिजर्व बैंक, शॉर्ट-टर्म बॉन्ड यील्ड में उछाल से निवेशकों की बढ़ी चिंता

Reserve Bank of India (RBI) ने बैंकिंग सिस्टम से अतिरिक्त नकदी (surplus cash) को कम करने के लिए आक्रामक रुख अपनाया है। इसका मकसद मार्केट रेट्स को **5.25%** के रेपो रेट के साथ अलाइन करना है, जिसके चलते शॉर्ट-टर्म बॉन्ड यील्ड्स में तेजी आई है और यिल्ड कर्व (yield curve) फ्लैट हो गया है।

रिजर्व बैंक की इस रणनीति का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि बैंकों के लिए उधार लेने की वास्तविक लागत 5.25% के रेपो रेट के दायरे में बनी रहे। इस कवायद का सीधा असर सरकारी बॉन्ड बाजार पर पड़ रहा है, जहां शॉर्ट-टर्म यील्ड्स लॉन्ग-टर्म डेट के मुकाबले कहीं ज्यादा तेजी से ऊपर जा रही हैं।

बाजार में 'बियर फ्लैटनिंग' का दौर

मार्केट एक्सपर्ट्स इसे 'बियर फ्लैटनिंग' (bear flattening) कह रहे हैं। आसान भाषा में कहें तो, शॉर्ट-टर्म बॉन्ड्स नकदी की कमी के प्रति ज्यादा संवेदनशील होते हैं, इसलिए उनकी दरें तेजी से बढ़ रही हैं। इस फाइनेंशियल ईयर में केंद्रीय बैंक ने ₹1 लाख करोड़ से ज्यादा के बॉन्ड बेचे हैं, जो पिछले एक दशक में सबसे बड़ा आंकड़ा है।

निवेशकों की बदली रणनीति

बाजार के बड़े खिलाड़ी अब अपना पोर्टफोलियो एडजस्ट कर रहे हैं। निवेशक 5-वर्षीय बेंचमार्क नोट्स से पैसा निकाल रहे हैं और 10-वर्षीय डेट पेपर्स में निवेश बढ़ा रहे हैं। इसका मकसद शॉर्ट-टर्म बॉन्ड्स में दिख रही अस्थिरता से खुद को बचाना है।

इकॉनमी पर क्या पड़ेगा असर?

शॉर्ट-टर्म यील्ड्स के बढ़ने का मतलब है सरकार और कॉरपोरेट कंपनियों के लिए कर्ज लेना महंगा होना। इससे बिजनेस की गतिविधियों पर दबाव आ सकता है। साथ ही, कच्चे तेल की कीमतों (crude oil prices) और बढ़ती महंगाई की चिंताओं ने बॉन्ड बाजार पर दबाव और बढ़ा दिया है। अब निवेशकों की नजरें अक्टूबर में होने वाली Monetary Policy Committee (MPC) की मीटिंग पर टिकी हैं, जहां से ब्याज दरों की भविष्य की दिशा साफ होगी।

Disclaimer: This article is published for informational purposes only. This is not a buy sell recommendation.