अगस्त में होने वाली RBI की मॉनेटरी पॉलिसी मीटिंग से पहले, बाज़ार में ये उम्मीद की जा रही है कि केंद्रीय बैंक बेंचमार्क रेपो रेट को स्थिर बनाए रखेगा। महंगाई को लेकर चिंताएं, ग्लोबल सप्लाई के रिस्क और मॉनसून का असर, इस फैसले के पीछे मुख्य कारण माने जा रहे हैं।
महंगाई का पहरा, रेपो रेट पर रोक?
अगस्त की शुरुआत में, 3 से 5 अगस्त के बीच होने वाली रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) की मॉनेटरी पॉलिसी कमेटी (MPC) की मीटिंग पर सबकी नज़रें टिकी हैं। ज़्यादातर एक्सपर्ट्स का मानना है कि RBI इस बार भी रेपो रेट में कोई बदलाव नहीं करेगा और इसे मौजूदा स्तर पर ही बनाए रखेगा। ऐसा करके RBI अर्थव्यवस्था की बदलती चाल पर नज़र रखेगा और स्थिरता लाने की कोशिश करेगा।
महंगाई की चिंताएं -
RBI के लिए सबसे बड़ा सिरदर्द रिटेल महंगाई दर (Retail Inflation) है। ग्लोबल टेंशन की वजह से एनर्जी की कीमतों में उठापटक, कच्चे तेल के बढ़ते दाम और मॉनसून की चाल, ये सब मिलकर महंगाई को बढ़ा रहे हैं। बाज़ार के जानकारों का कहना है कि चूंकि महंगाई की ये दिक्कतें सप्लाई साइड (Supply Side) से जुड़ी हैं, न कि सिर्फ डोमेस्टिक डिमांड (Domestic Demand) से, इसलिए RBI के पास रेट कट (Rate Cut) करने की गुंजाइश कम है। मौजूदा रेट्स को बनाए रखकर RBI घरेलू ग्रोथ को सपोर्ट करने और महंगाई को टारगेट रेंज में रखने के बीच संतुलन साधने की कोशिश करेगा।
आगे क्या? -
हालांकि अगस्त मीटिंग में दरें स्थिर रहने की उम्मीद है, लेकिन RBI भविष्य को लेकर थोड़ा सतर्क रुख अपना सकता है। कुछ एक्सपर्ट्स का मानना है कि अगर महंगाई लगातार उम्मीद से ज़्यादा बढ़ती है, तो फाइनेंशियल ईयर (Financial Year) के आखिर तक RBI ब्याज दरों में बढ़ोतरी भी कर सकता है। इस फाइनेंशियल ईयर के लिए महंगाई के अनुमानों पर भी चर्चा की जा सकती है, और RBI विदेशी महंगाई के रिस्क को देखते हुए अपने अनुमानों को बढ़ा भी सकता है। RBI की तरफ से आने वाले बयान पर बारीकी से नज़र रखी जाएगी कि कैसे इन सब चीज़ों को संभाला जाएगा।
लिक्विडिटी और बाज़ार -
ब्याज दरों के अलावा, बैंकिंग सिस्टम में लिक्विडिटी (Liquidity) का मैनेजमेंट भी RBI के लिए अहम है। इस रिव्यू में लिक्विडिटी पॉलिसी में बड़े बदलाव की उम्मीद कम है। इसके बजाय, RBI वेरिएबल-रेट रेपो ऑक्शन (Variable-rate repo auctions) जैसे टूल्स का इस्तेमाल करके मनी मार्केट की कंडीशन को ठीक करता रहेगा। इससे यह पक्का होगा कि बैंकिंग सिस्टम के पास इकोनॉमिक एक्टिविटी को सपोर्ट करने के लिए पर्याप्त फंड है और ब्याज दरों में ज़्यादा उतार-चढ़ाव न हो। 5 अगस्त को आने वाले ऑफिशियल पॉलिसी स्टेटमेंट से यह अंदाज़ा लगेगा कि RBI घरेलू ग्रोथ और ग्लोबल इकोनॉमिक हेडविंड्स (Global economic headwinds) को लेकर क्या सोच रहा है।
